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Wednesday, 16 November 2011

एक प्रश्न उधो!































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एक बात बताओ ,उद्धव !
जब  कृष्ण  ने  तुम्हे भेजा था 'हमें' समझाने के लिए,
ख़ास मुझ बावरी को ही समझाने के लिए
आने से पहले क्या तुमने देखी थी कान्हा की आँखें   ?
जिव्हा से तो कुछ भी कह दिया होगा निर्मोही ने
,
क्या तुमने पढ़ी थी
मेरे मन की पीडा उसकी आँखों में ?
कालिंदी का तट ,वट- वृक्ष, गोकुल के सब सखा, गैयाएं उन में समा कर भी
क्या झांक रहे थे उन  आँखों में से ?
क्या मेरी प्रतीक्षा भी थी कहीं उनमे ?
"इतने" प्रेम को एक झटके से  कैसे भुला सकता है कोई ?
तुम तो नंदनंदन-सखा हो
सकल जोग के ईस भी कहते हैं तुम्हे
सूखता दिखा क्या नेह महासागर कान्हा की आँखों में ?
कर्म ,कर्त्तव्य और प्रेम में से कैसे सहजता से
चुन लिया उसने  कर्त्तव्य-मार्ग को !
मुझे तो कोई शरारत लगती है नटखट की
फिर मुझे सताने की ,
क्या उसने भेजा है तुम्हें  इसीलिए
कि -   तुम जा कर बता सको
मेरी तड़प  सांवरे को
उधो! तुम तो ज्ञानी हो न ? देखना ,
कान्हा की आँखों से
चुपके चुपके जो आँसूं बहते हैं
उनमें  से कौन से मेरे आँसूं
और कौन से तुम्हारे कान्हा के हैं ?
क्या उत्तर है इस प्रश्न का  तुम्हारे पास ?
इसका उत्तर तो आज तक नहीं दे पाया तुम्हारा कृष्ण भी ,
आज भी मेरा ये प्रश्न उत्तर की प्रतीक्षा में युगों से वहीं खडा है,
है कोई उत्तर किसी के
 पास ?                    
                            
   






16 comments:

  1. अच्छी रचना, अच्छे भाव

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  2. राधा तो भगवान की धारा है...
    राधाभाव को जीती हुई रचना!

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  3. कृष्ण ज़रूर चुपके से रोये होंगे,
    उद्धव ने भी चुप से आंसू पोंछे होंगे !

    ऐसाइच था,बावरा किसना ...!

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  4. प्रेम के एक शाश्वत प्रसंग के जरिये अभिव्यक्त होते मनोदगार !

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  5. मैं कुछ कहना चाहता हूँ, बहुत कुछ कहना चाहता हूँ, पर असहाय हूँ शब्द जो नहीं मिल रहे. क्षमा.

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  6. @neeraj trivedi
    कौन हो बाबु? आँखें मूँद कर दो पल के लिए वहीँ आ कर बैठ जाओ जहां मेरे कृष्णा ने हाथ पकड़ कर मुझे बिठा लिया था.
    हमारी बातें सुनो और बोल दो ......शब्दों की कमी नही रहेगी.
    यूँ कितना कुछ तो बोल गये हो तुम बातूनी !और कहते हो 'शब्द नही मिल रहे'
    अच्छा लगा तुम्हारा आना.
    आना 'आरती' पढना .
    खुश रहो

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  7. sakhiyoun ka jabab to khud kanha ke bhi bas mein na hai ............

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  8. अच्‍छी रचना .. कुछ प्रश्‍नों के उत्‍तर नहीं होते !!

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  9. बस यही कह सकती हूँ ………

    जब धारा का प्रवाह प्रभु की तरफ़ मुड जाता है
    तब वही धारा राधा बन जाती है
    यही तो है राधा भाव जो कान्हा मे बहती है
    दो हों तो कोई दिखाये वियोग
    दो हों तो दिखें दो अस्तित्व
    मगर जब एकत्व का साम्राज्य हो
    वहाँ कहो कैसे दो का भान हो और फ़र्क दिखे………
    वैसे भी अश्रुओं की तो कोई जात ही नही होती
    तो भिन्नता कैसे सम्भव है
    फिर कैसे राधा हो या मीरा
    कृष्ण हो या राम
    उनके अश्रुओं को पृथक करूँ
    आईने के चाहे कितने टुकडे करो
    अक्स को चाहे कितने हिस्सों मे विभक्त करो
    मगर अस्तित्व पृथक कब होते हैं
    ये तो राधा श्याम के दो रूप भासते हैं
    मगर इक दूजे से अलग कब होते हैं ………
    शायद तभी ऊधो तुम तो क्या
    कोई ना भेद ये पायेगा
    अश्रुओं के माध्यम से भी
    हमें कोई ना अलग कर पायेगा

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  10. जब धारा का प्रवाह प्रभु की तरफ़ मुड जाता है
    तब वही धारा राधा बन जाती है
    यही तो है राधा भाव जो कान्हा मे बहती है
    दो हों तो कोई दिखाये वियोग
    दो हों तो दिखें दो अस्तित्व
    मगर जब एकत्व का साम्राज्य हो
    वहाँ कहो कैसे दो का भान हो और फ़र्क दिखे………
    वैसे भी अश्रुओं की तो कोई जात ही नही होती
    तो भिन्नता कैसे सम्भव है
    फिर कैसे राधा हो या मीरा
    कृष्ण हो या राम
    उनके अश्रुओं को पृथक करूँ
    आईने के चाहे कितने टुकडे करो
    अक्स को चाहे कितने हिस्सों मे विभक्त करो
    मगर अस्तित्व पृथक कब होते हैं
    ये तो राधा श्याम के दो रूप भासते हैं
    मगर इक दूजे से अलग कब होते हैं ………
    शायद तभी ऊधो तुम तो क्या
    कोई ना भेद ये पायेगा
    अश्रुओं के माध्यम से भी
    हमें कोई ना अलग कर पायेगा

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  11. ओह, उद्धव का उहापोह...


    दो से एक हुए दोनों के बीच झूलते उद्धव...

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  12. What day isn't today?

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  13. बहुत सुन्दर कविता और मन में उठने वाले भाव भी ......

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  14. कान्हा की आँखों से
    चुपके चुपके जो आँसूं बहते हैं
    उनमें से कौन से मेरे आँसूं
    और कौन से तुम्हारे कान्हा के हैं ?
    अच्‍छी रचना .. कुछ प्रश्‍नों के उत्‍तर नहीं होते !!

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