उसकी पोटली
पहला दृश्य
बात यही कोई सैंतीस अडतीस साल पुरानी
नवयुवक ...नही किशोर. गाँव से शहर पढ़ने के लिए जाने को तैयार....
एक रिश्तेदार को अपने बाबूजी से कहते सुना-' काहे पढ़ने भेज रहे हैं,गाँव के दुसरे लडके गए.शराब,कबाब सब सीख लिए.गैर जात में बियाह भी कर लिए.भोले भाले को भेज रहे हैं ऊ भी बिगड कर धुल हो जायेगा'
'नही. हमारा बेटा ऐसा नही है, वो ऐसा कभी नही करेगा,हम जानते हैं उसे '- पिता ने जवाब दिया.
जरूरी सामान के साथ वो ले आया एक पोटली जिसमे उसके बाबूजी का विश्वास था.पोटली जैसे उसकी चमड़ी बन कर चिपक गई उससे.
दूसरा दृश्य
रात तीन बजे.उस ने दरवाजा खटखटाया.दोस्त की अम्मा ने दरवाजा खोला,चिल्लाई-'इतनी रात गए कहाँ से आ रहे हो? वो भी सायकिल चला के आये हो ? भीतर आओ. इतना ठंडा पड रहा है.कुछ सऊर है कि नही? '
वो नजर झुकाए चुप्पी साधे खड़ा था. घबराया सा.चिमनी की रौशनी में उसके माथे पर चुह्चुहाई पसीने के बूंदों में उसका चेहरा दमक रहा था.'बैठ जाओ बबुआ ! अभी उठाते हैं रामदीन को.कित्ते बजे निकले अपने घर से ?साईकिल पर तो दो तीन घंटा लगा होगा न तुम्हे? दो साल से गाँव छोड़ कर हिंया पढ़ रहे हो.ऐसे तो कभी नही आये ?बिराह्मिन के बेटे हो.ऊ भी हमारे गुरूजी के....ऐसे बखत में??? बबुआ हमको डराए दिए हो'- बिट्टन चाची बोली.
'चाची ......'- बोल नही निकल रहे थे उसके गले से. आँखों से आंसू फूट पड़े.
'हाय दैया ! क्या हुआ बचुआ ? ' खटिया पर बैठाते हुए बिट्टन बोली. 'नही रे बबुआ.रो नही.हमे बताओ बात का भई ?'
'चाची! ओ है न हमारी मकान-मालकिन ... .रात हमारे बिस्तर पर आके....'
'काहे अंदर कुण्डी चढाय के नही सोये थे का?
'नही,, खम्बे की रोसनी में पढते हैं.खटिया बाहर चबूतरे पर डाल के सो जाते हैं. हम तो रोज ऐसा ही करते हैं .'
'का बोले बच्चा अब तुम्हे! कलिजुग में काहे पैदा हुए ?'
तीसरा दृश्य
उसके हाथ में एक बच्चा एक कागज थमा गया.
खोला .पढा. आवाज लगाई-'सुमन! ये चिट्ठी तुम लिखे हो?'
'हाँ. क्यों?' -सुमन प्यारी सी शर्मीली लड़की.
'दो तमाचा देंगे न,मुंह तोड़ देंगे तुम्हारा.हमे क्या समझे हो तुम? यहाँ बस यही सब करने आये हैं? पढ़ लिख कर इंजीनियर बनना है हमे. अब ऐसा किया न तुम्हारे बाबूजी को लेजा कर दे देंगे ये चिट्ठियां.'
पोटली खून बन कर उसकी रगों में दौड़ने लगी थी.
दृश्य चार
शानदार पांच सितारा होटलका एक कमरा
'सर.............'- वो बोली.
'थेंक्स मेडम !बट....सॉरी...सॉरी...' उन्होने दरवाजे तक 'उसे' छोड़ा.
लड़की के आँखों में आश्चर्य भी था और शायद.....खिल्ली का भाव भी. नही...नही..उसे आश्चर्य ज्यादा था.
'सर! आपके साथ वो पास वाले रूम में जो ऑफिसर रुके हैं न ........' लड़की ने बात पूरी की - ' कल रात मेरी फ्रेंड को कहते हैं 'मेरी बेटियों की आँखें मुझे देखती है....और देखिये फ्री में मिली 'फेसिलिटी' को भी.....'
पोटली उनकी साँसों में तब्दील हो गई थी.
दृश्य पांच
'सर! मेरे पति को प्रमोशन ..... आप जो चाहे......'
'अपने पति के लिए आप इस हद तक.......नत-मस्तक हूँ मैं आपके त्याग के आगे. किन्तु प्रमोशन... अब तो बिलकुल नही.विजय को अपनी काबिलियत और मेहनत पर यकीन करना चाहिए.आप मेरी बेटी ,छोटी बहन जैसी है...मैं आपका सम्मान करता हूँ .बस एक बात कहूँगा अब कभी आपके पति 'ऐसी' कोई बात आपके सामने रखे. दो झापट लगाना उसे. अपने आपको सीढी मत बनाइए '
पोटली उनकी आत्मा का अंश बन चुकी थी.बहुत बडी हो चुकी थी पोटली.अब उसमे माँ,पत्नी,उनके अपने बच्चो का विश्वास भरा था.
'आपको बोझ नही लगा इसका कभी?' मैंने पूछा.
'वो मेरी ताकत बन गया,उसकी रौशनी हर जगह मेरे साथ रही.और अब तो.....आपका विश्वास भी इसमें रखा है.पोटली को बहुत संभाल कर रखता हूँ.'- बच्चों सी मासूम मुस्कान शायद उसी पोटली से निकली है.
और आगे......
'बाबु! अगर कहीं भगवान होगा तो वो जरूर तुम-सा ही होगा. मुझे जब भी भगवान की जरूरत पड़ी.वो नही आया. तुम आये.मुझे तो जुबान भी नही हिलानी पडती है.तुम कैसे जान जाते हो कि मैं परेशानी में हूँ,दुखी हूँ.'
'........................बुद्धू! ओ मेरा बच्चा! एकदम बुद्धू है तू ! ' और अच्छा लगता है मुझे एकदम बुद्धू बच्चा बनकर रहना उनके सामने .'- 'उसने' भी अपने मन की बात मुझे बताई.
'दीदी! मैं बात बाद में करती हूँ,रोती पहले हूँ.वो शांत भाव से मेरी बात सुनते हैं फिर 'गाइड' करते हैं.सब 'उन जैसे क्यों नही है?'
'पोटली तो सबको मिलती है.पर कोई साथ ले के ही नही निकलता.तो कोई रास्ते में छोड़ भागता है.कोई उसमे से थोडा सा निकाल लेता है जरूरत भर.और उन जैसे.....धीरे धीरे'उस' पोटली में ही तब्दील हो जाते हैं'......
एक काल्पनिक पात्र 'राजू गाइड' जीवन भर उस पिताम्बर को अपने से अलग नही कर सका.पीताम्बर गाँव वालों का विश्वास था. राजू 'महात्मा' बन गया. और 'ये' ?????? एक सत्य,सजीव पात्र ....जिसे मैं जानती हूँ और आश्चर्यचकित हूँ.
पुरुष भी उच्च-चरित्र के होते हैं. पर मैंने नही देखा कभी ऐसा कोई इंसान. भूख....खाना है ही नही....भूखा रहना...मजबूरी.
भूख...सामने खाना ....और इनकार,उस और देखना नही.
अंतर है न दोनों में? आप क्या कहेंगे?



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