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Thursday, 13 October 2011

यादों के साये में इलाहाबाद





'ये क्या जगह है दोस्तों ,ये कौन सा दयार है '

जो भी हो 'हद-ए-निगाह तक यहाँ गुबार ही गुबार नही है '

यह इलाहबाद रेलवे  स्टेशन है ,वहां का प्लेट फॉर्म,वहां की एक सड़क है .
वो शहर जो मेरी आत्मा में बसता है, सपनों में आता है, उदास होती हूँ तो माथे पर हाथ फेरता है.

अरे ! एकदम पगली लगती है 'ये',  अगर कहूँ राजनीतिज्ञों,साहित्यकारों,तीन -तीन   नदियों के संगम वाले इस शहर के  अल्फ्रेड पार्क में मुझे अंग्रेजो की गोलियों की आवाजे स्पष्ट सुनाई  देती है, मैं लहूलुहान  आजाद को देखती  हूँ , उनके खून से लाल हुई मिट्टी की नमी को आज भी अपनी अंगुलियों से महसूस  कर लेती हूँ ,
पागलपन ही लगेगा   न ?

मगर जब आप किसी से आत्मिक,भावनात्मक रूप से जुड़ जाते है तब.....

मेरी जन्म भूमि है, मेरे पापा की कर्म भूमि- एयर फोर्स में थे, मम्मी शादी के जस्ट बाद कानपुर, उसके बाद इलाहाबाद आ के रही, बचपन और बाद में युवावस्था का कुछ समय भी मेरा यहाँ बीता .

धीरे धीरे इलाहबाद मेरे जीवन का एक अहम हिस्सा बन कर त्वचा की तरह मुझसे चिपक गया.

 लम्बे अरसे बाद बडे बेटे अभिषेक के ससुराल रांची से आते समय मैंने 'इनसे' पूछा -
''इलाहबाद आएगा क्या ?''

 ''हाँ ! मगर आधी रात गए आएगा, तुम सो जाओ, मैं जगा दूंगा ''

मगर मैं ....जागी रही,  इन्हें नींद लग गई तो ...? इलाहाबाद निकल जाएगा .

देर रात मुझे जगाया-''सुनो! 'तुम्हारा' इलाहबाद आ गया .''

मैं लेटी रही ...कुछ नहीं बोली ....बर्थ से उठ कर 'गोस्वामीजी' पास आये -'' रो रही हो ?......चलो उठो, प्लेट फॉर्म पर चल कर सभी चाय,कोफी लेंगे''

टीटू,ऋतू,अप्पू,प्रीटी  हम सब नीचे उतर आए . बहुत कुछ बदल गया था फिर भी दुसरे शहरों की  तुलना में यह स्टेशन इतना नही बदला था. चाय वाले से मैंने पूछा -''भईया ! यहाँ प्लेटफोर्म  पर ही( शायद )जमीन पर लेटे हनुमानजी की मूर्ति थी न कहीं ? ''

   ''हाँ! अब भी है, संगम के उधर, यहाँ तो प्लेटफार्म  पर मज़ार है ,बिटिया !   पहले भी कभी आई हो बिटिया ?'' 

''कई साल पहले आई थी ....''   

  ''अब तो अलाहाबाद बहुत बदल गया है,बिटिया !.''

मैंने कोई जवाब नही दिया ....पूरा बदल भी जाए तो भी .......कोई देख पाता, ...पर मैंने देखे वहां ...अपने पापा के क़दमों के निशान, मम्मी की प्लेटफोर्म को छूती साड़ी की कोरें और एक छोटी सी बच्ची के  छोटे छोटे कदमों  की छापें .......

''ट्रेन रवाना होने वाली है, चलो ''   इन्होने कहा या बच्चों में से किसी ने, याद नही .
अपने कोच में आ कर बैठ गई ,पर अकेली नहीं थी मेरे साथ थे पापा,मेरी युवती मम्मी,  एक छोटी सी बच्ची
और इलाहबाद शहर , उसकी सड़कें , उसकी गलियां .......मेरी आत्मा में समा गए थे सारे..एक साथ .....
आज भी मुझी में रहते हैं ..मेरे आखिरी समय तक रहेंगे सब ...मेरे साथ ....