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Monday, 31 October 2011

पांच बेटियाँ पांच कहानियाँ और....एक सत्य- (भाग -दो






बी.ए.प्रथम वर्ष.हम चार सहेलियाँ नाम??? कुछ भी रख दीजिए सिवाय मेरे.मैं -इंदु-
कॉलेज  से आते हुए रास्ते में ही खबर मिली राजश्री के पापा ड्यूटी पर किसी दुर्घटना के शिकार हो गये. वे बिजली से बुरी तरह जल गये थे,राजस्थान विद्युत बोर्ड में सर्विस करते थे.तीन दिन बाद वे चल बसे.सबसे बड़ा भाई ...निकम्मा.दो छोटे भाई आठ और दस साल के. बड़े भाई की पढाई लिखाई के आधार पर उसे ड्राइवर या चपरासी की नौकरी मिल रही थी, मना कर दिया उसने.

राजश्री को पढाई छोड़ नौकरी करनी पड़ी और पूरा परिवार की जिम्मेदारी भी.

समय बीता..भाई जवान हुए पढाया लिखाया. एक साल के बेटे का पिता बन चुका मंझला घर से गायब हुआ .. एक दिन जंगल में उसके कंकाल का कुछ हिस्सा मिला.

विधवा भाभी की नौकरी लगवाई. छोटे भाई की शादी की. मैंने राजश्री को समझाया-'तू शादी कर ले राजश्री ! भाई बड़ा हो गया हैं, उस पर भी जिम्मेदारी डाल.'
राजश्री ने शादी की किन्तु शहर नही छोड़ा. छोटे भाई का पैरों पर खड़ा होना बाकि था.......उसकी बहु आई. छोटे मोटे झगड़े शुरू हुए.राजश्री थोड़ी दूरी पर अलग रहती थी...... एक दिन भाभी ने जहर खा लिया.इलज़ाम राजश्री और उसकी माँ पर.
राजश्री उस समय ड्यूटी पर थी.ऑफिस रिकोर्ड और स्टाफ गवाह था.पुलिस ने अंडरग्राउंड होने का मौका दे दिया.बरसों की तपस्या का फल....बदनामी...पैसों की बर्बादी....रिश्तों पर अविश्वास.


                                      २

समर ट्रेनिंग के दौरान एक एक टीचर मिली..नाम ? नीलू. नीलू भाटिया. उम्र पच्चीस छब्बीस साल.

दुबली पतली. उदास-सी. एकदम मुरझाया सा चेहरा.गले में ढेरो गंडे ताबीज.पढ़ी लिखी हो कर इतने डोरे,ताबीज ! कम से कम एक टीचर को तो ये सब नही करना चाहिए.समाज में एक मेसेज जाता है शिक्षक वर्ग से.यही कारन है मुझे उसकी उपस्थिति से घबराहट होती थी और मेरी नजर बार बार  उसके गले पर जा कर टिक जाती.
''बीमार हो?''-मैंने पूछा.

''हाँ.जाने क्या क्या होता है''-उसने बताया.

वो  तलाकशुदा थी.एक  पांच वर्षीय बेटी की माँ भी.  घर वाले दुबारा शादी नही करना चाहते थे. कमाऊ, उस पर सारी तनख्वाह भाई भाभी के हाथ में ले जा कर देती थी. पिता नही थे. माँ खुद बेटे बहु के भरोसे.

''दूसरी शादी क्यों नही कर लेती?''-मैंने प्रश्न किया.

''घर वाले नही चाहते.बेटी शादी करके चली  जायेगी.एक भतीजे को गोद ले लूंगी वो 
बुढापे में मेरी सेवा करेगा.''-पच्चीस वर्षीय युवती का जवाब था.

'' घर वाले क्यों चाहेंगे तुम्हारी शादी करना?पूरी तनख्वाह तो बेटे भी ले जा कर हाथ पर नही रखते.''

''क्या करू?''-नीलू ने पूछा.

''एड दो. पूरी छान बीन करो.पता लगवाओ लडके के बारे में. और........शादी कर लो.ऐसा बंदा जो तुम्हारी बेटी को भी स्वीकार कर ले.''

............. और एक दिन एक युवती मेरे पास आई.कांजीवरम की साडी पहने,ढेरों चुडीयाँ.प्यारी सी वो युवती स्मार्ट लग रही थी.

''मेडम! आपने बताया था.आप नाम,चेहरे भूल जाती हैं.मैं नीलू...नीलू भाटिया.दो साल पहले हम ट्रेनिंग में मिले थे....याद है? 
मेडम! परसों मेरी शादी है.'वे' यहीं चित्तोड के ही हैं.तलाकशुदा है.मेरी बेटी सहित मुझे स्वीकार करने को तैयार हो गए थे. उनके भी एक बेटी है. मुझे मालूम पड़ा कि आप यहाँ आई हुई है मैं आ गई. आप शादी में आएँगी न?''

आज वो खुश है.उसने अपना शोषण नही होने दिया.विद्रोह किया.अच्छी बेटी,अच्छी बहिन बनने की कीमत चुकाने को तैयार नही थी.

ठीक किया न?


बाकि से मिलवाऊँगी किन्तु....फिर कभी