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Friday, 15 June 2012

काकीसा

'उन्हें' बरसों से जानती हूँ मैं.  छोटी से बड़ी उनके सामने हुई हूँ. आज कल कहाँ है?  कैसी है ?  है भी या  नही? नही मालूम.
 
आम तौर पर उस समय राजस्थान मे विवाहित औरते प्लास्टिक की चूडियाँ नही पहनती थी, मगर मैंने उनके हाथ मे प्लास्टिक की चूडियाँ ही पहने देखी उन्हें, वो भी लाल,पीली नही होती थी.
 ना माथे पर बिंदिया, ना हाथो मे मेहँदी और ना ही  'सुहाग' की कोई निशानी.
पहली नजर मे .......उन्हें देख कर कोई भी यही अंदाज़ लगाता कि...  ...

'उनकी' बहु को हमेशा लाल पीले कपड़ो मे देखा, छोटा सा घुंघट डाले हाथो मे खनकती कांच की चूड़िया, मेहँदी, चमकती आँखें, उस पर हरदम मुस्कराता चेहरा .
एक छोटी सी बिटिया छः सात साल की  आस पास ही डोलती हुई, बतियाती हुई, कभी खेलती हुई अक्सर दिख जाती थी.

कभी कभी मैं दादी,पोती और बहु को एक साथ मंदिर जाते हुए भी देखती थी. 

  अपनी ही दुनिया मे मस्त रहने की आदत थी बचपन से मेरी ,.....

पर जाने क्यों उन सास बहु और बच्ची से रुक कर जरुर बातें करती थी.

जैसे एक अलग़ ही दुनिया थी उनकी,  कभी कभी लगता अपने आप से नाराज़ है और कभी सारी दुनिया से नाराज़..कभी सब...नोर्मल ...

एक दिन 'जिया' -वो बुजुर्ग अम्मा -को पकड कर बैठ ही गई ......

''जवान बेटा था मेरा, अकेला, और कोई भाई  बहिन हुए ही  नही उसके. बहुत अच्छा बेटा था मेरा,  थूका नही लांघता था अपने माँ बाप का, एकदम 'सरवन कुमार'. पढ़ाया  लिखाया काबिल बनाया, सरकारी नौकरी लग गई डाक्टर था.'-जिया बतला रही थी.
अच्छे घर मे ब्याह किया, मेरी बहु को तो तू  जानती है ना बेटा? पढ़ी लिखी इकलोती बेटी है अपने माँ बाप की.शादी के छः महीने बाद ही...एक्सीडेंट मे मेरा बेटा .........''  
जैसे सब कुछ अभी ही घटित हो रहा हो ...वो आँगन के बीचो बीच एकटक देख रही थी -    '' ''यहीं ला कर लेटाया था मेरे लाल को .......हंसता हुआ नौकरी पर गया था, ऐसे वापस आएगा ......"   जिया का क्रन्दन आज भी ज्यों का त्यों मेरे कानो मे गूंजने लगता है. पास बैठी  बहु की आँखों से टप टप आंसू  गिर रहे थे.  एकदम चुप थी सुन रही थी सब, बस .

''    'इसके' पेट में पांच महीने का बच्चा था, तुम्हारे 'बासा'  और मैं जान दे देते पर जवान छोरी वो भी गर्भ से ....किसके भरोसे छोड़ के मरते हम दोनों इसे. इसके माँ बाप को भी समझाया 'गिरवा दो' बच्चा ... ब्याह दो कही लेजा कर इसे.  पर उस जमाने मे दूसरी शादी वो भी विधवा की???? और .....फिर 'सवार्थी ' हो गई थी मैं, शायद मेरा लाल वापस आ जाए ?''

''मेरा लाल 'मेरी पोती के रूप मे वापस आ गया, सोना बेटा ! ''

''पर जिया आप ऐसे क्यों रहती हैं ? '' मैंने पूछा. (मेरे ही  बचपन का नाम है 'सोना' .)

''पहनने ओढने सिंगार करने के दिन तो 'इसके' थे , इसकी उम्र है ये सब करने की .......मैंने और  तुम्हारे 'बासा' ने इसे पहले के जैसे ही रहने  को कहा, सबने बहुत हंगामा मचाया पर मैंने, 'इन्होने' किसी की परवाह नही की.''
''मैं ....मैं ..ऐसी क्यों ? कैसे सुहागन बन के घुमती अपनी जवान विधवा बहु के आगे ? कैसे अपने पति के कमरे में ....?'' जिया की आवाज़  बात पूरी होते होते भर्रा गई थी.

उस घटना को लगभग चालीस साल हो गए .
जिया और बासा गृहस्थ हो कर भी सन्यासियों की तरह रहे .
सुहागन हो कर भी बहु के वैधव्य की सारी पीड़ा खुद ने ओढ़ ली 
बासा .?...कहते हैं, कभी जिया को छुआ तक नही....
जहाँ अक्सर बहुओं को ससुराल प्रताड़ना दी जा रही है, जाने क्या क्या पढने और सुनने को मिलता है ,वहां 'ये लोग'.....?इन जैसे लोग ? इनके उठाए ये छोटे छोटे दृढ कदम ....
क्या कहेंगे आप ?
मुर्खता ?
पागलपन ?
दर्द की पराकाष्ठा ,बेटे-बहु के प्रति प्यार का अद्भुत रूप ?
मुझे नही मालूम क्या नाम देना चाहिए? पर धरती की ख़ूबसूरती शायद ऐसे लोगो से ही बढती है .
मैं तो यही मानती हूँ और आश्चर्यचकित हूँ ....
औरत के इस रूप को देख कर .....
प्यार करती हूँ मैं ऐसे लोगों से 
आप????? क्या कहेंगे आप?