आज अचानक एक बात याद आ गई. बताऊँ? हा हा हा यूँ बात हँसने वाली ही है.
बचपन से स्वभाव मे एक बोल्डनेस थी मुझ मे.को- एड्यूकेशन मे पढाई हुई कोलेज स्तर की.तब लड़कियों के लिए अलग कोलेज की बात तो दूर लडकियां कोलेज भी कम जाती थी.चार मोहल्ले से हम चार लडकियां एक साथ मिलकर कोलेज जाते थे. पहले दिन हम भीतर से डरे हुए थे.
कोलेज के छत पर खड़े चार पांच लडको मे से एक ने आवाज लगाई -''गर्ल्स! इधर...ऊपर आओ .''
पहला दिन . रेगिंग का नाम भी सुना हुआ था. डर के मारे हालत पतली . तीनो साथ वाली लडकियां चुप.
'क्या काम है? आपको कोई काम हो ,बात करनी हो ...नीचे आ जाइये.''-मैंने जवाब दिया.
''जानती हो मैं कोलेज का दादा हूँ .स्वेन्द्रपाल सिंह 'पुतली' मेरा नाम है '' (देखो तो नाम याद आ गया.)
''यह तो खुशी की बात है.फिर तो हमे कोलेज मे किसी से डरने की जरूरत नही.आप जैसे हमारे शेर भाई जो हैं यहाँ''- वापस मैंने ही जवाब दिया और अपनी क्लास रूम मे घुस गई.
२
''वो एक लड़का है ना मुझे देखता है.क्लास के बाहर खड़ा हो जाता है .निकलती हूँ तो कहता है 'डरना मत''-प्रेमलता ने बताया.
क्लास छूटने पर देखा वो महाशय वहीँ खड़े थे.हम चारों बाहर निकली.उसके सामने जा कर मैं रुक गई.
''बात करनी है?करो. देखना है?देखो हम खड़े हैं जब तक आपका मन नही भर जाता हम खड़े रहेंगे.'
''नही.इंदु जी ! ऐसी बात नही है.मैं तो....मैं तो...'' वो जाने क्यों हकलाने लगा.शायद उसे इस तरह के व्यवहार या प्रतिक्रिया की उम्मीद नही थी.
'' अच्छी फेमिली से लगते हो.हम यहाँ पढ़ने आये हैं जिस दिन आपको लगे कि हमे 'कोलेज की हवा' लग गई है आप यहाँ खड़े रहेंगे.कमेन्ट करेंगे हम कुछ नही बोलेंगे.ठीक है?' -मैंने उसे कहा.नाम भूल गई जाने क्या नाम था उसका.
३
अंग्रेजी साहित्य की क्लास के बाद एच.आई.सी.सी. विषय का पीरियड होता था.अंग्रेजी साहित्य की क्लास अक्सर लेट छूटती थी. तो उन सर का पारा चढ़ जाता. अब हम क्या करे. साहित्य की क्लास से जल्दी छोड़े तो हम समय पर उनकी क्लास मे आये.
एक दिन जैसे ही हम एच.आई.सी.सी.की क्लास मे घुसे.सर ने सबको कमरे से बाहर निकाल दिया.
बड़ी बदतमीजी से उन्होंने बोला-'चल बाहर निकल मेरी क्लास से' फिर एक एक का नाम ले के निकाला.
''हमारी क्या गलती है सर ? कल से हम टाइम पूरा होते ही भाणावत सर की क्लास छोड़ देंगे.आज हमे माफ कर दीजिए सर ! आज बैठने दीजिए प्लीज़'-मैंने उनसे प्रार्थना की रियली.
''तू बाहर निकल''
''आप जरा सा सोफ्टली बोल दीजिए मैं चली जाऊंगी.आपका बात करने का यह जो तरीका है वो एक गुरु के लायक नही है सर'-मैंने विरोध किया.पूरी क्लास के सामने उनका हम सबसे इस तरह बात करना...उफ़..इतना अपमानित खुद को कभी महसूस नही किया.
'' तू निकलती है या नही ? आऊट...आऊट ..सब निकल गए तू लाट साहब की....''
'' आप टीचर हैं?आपमें बात करने की तमीज है? किससे बात कर रहे हैं आप? आपकी स्टूडेंट हूँ मैं.'' और.. मैं सब भूल गई. दिमाग भन्ना गया. ''बे तुझे इतना मारूंगी. क्लास के बाहर आ. नही पढ़ना मुझे आगे. पर तुझे तो सीधा करूंगी. आगे तू अपने स्टुडेंट्स से तमीज से बात करना सीख जायेगा.''
'' आज के बाद तू मेरी क्लास मे नही आएगी. ये लड़की क्लास मे आएगी तो तुम सबको नही पढाऊंगा''- सर के इस तरह के व्यवहार के बावजूद किसी ने विरोध नही किया.लडके तक चुप्पी साधे बैठे थे.
''मैं खुद नही आऊंगी. तेरे सब्जेक्ट मे टॉप करके बताऊंगी ''-मैं गुस्से से कांप रही थी.
और.............. एक सप्ताह के लिए मुझे ब्लेक लिस्टेड कर दिया गया. पढ़ाई मे रिकोर्ड अच्छा होने के कारण प्रिंसिपल ने डांटा जरूर.रेस्टीकेट नही किया.
शादी हुई.(तब फर्स्ट यीअर के पेपर्स चल रहे थे मेरे.) ससुराल के मेरे पडोसी निकले यही सर. और हाँ मैंने उनके सब्जेक्ट की क्लास साल भर अटेंड नही की .७९% बने जो उस समय बहुत बड़ी बात मानी जाती थी हा हा हा
४
ससुराल मे पढाई जारी रही.अंगरेजी साहित्य कठिन लगती थी. मेडम जी स्टाफ रूम मे बैठी रहती या ...पढ़ाती ही नही.कभी पढाती तो सब ऊपर से निकल जाता.इस विषय की दो ही छात्राए थी हम.शायद सब्जेक्ट टीचर नही होंगे तब. ससुर जी ने कोलेज के रिटायर्ड प्रिंसिपल के यहाँ ट्यूशन लगा दी.
कुछ दिन पढाई लिखाई ठीक चलती रही.मेरी उम्र तब उन्नीस साल ही थी.
गुरूजी महोदय अब 'सेक्स' शब्द का उपयोग करने लगे.मैं किताब मे नजर गडाये चेहरे को सपाट रखे चुपचाप सुनती रहती. डर के मारे मेरा हाल खराब.
मैंने ट्यूशन पर ना जाने का कोई ना कोई बहाना ढूँढना शुरू कर दिया.घर मे डरकर किसी को कुछ बताऊँ भी नही. इधर ससुर जी गुस्सा.
''ये क्या तरीका होता है .जाओ पढ़ने. फीस जमा कराई है. तुम्हे मालूम नही पड़ता क्या? ऐसे कैसे आगे पढाई करोगी? चलो निकलो इसी समय.''-दा'साहब ने डोज़ दे दी अपुन को.
मैं पढ़ने नही गई.अपनी कजन के यहाँ रुक गई जिनकी शादी भीलवाडा मे ही हुई थी. अगले दिन रो धो कर बहाने बना कर पीहर आ गई.
तीसरे दिन दा'साहब के समाचार आ गए. 'इसकी पढाई खराब हो रही है.इसे भेजिए.'
और..............फिर उन्ही गुरूजी के शरण मे अपन तो. वो फिर शुरू . बुजुर्ग व्यक्ति. किसी को क्या कहूँ? पति को कह दूँ और वो उनके साथ मार पीट करने लग जाए तो??? लोग मेरे लिए क्या क्या बोलने लगेंगे? ससुराल वाले मुझे ही दोषी ठहरा देंगे तो??? रात दिन यही बात दिमाग मे घूमती रहती.
और एक दिन................
'' शेक्सपियर ने कहा 'सेक्स'.......''- सर शुरू हो गए. (अब शेक्सपियर ने 'ऐसा' कभी कहा भी हो तो भी मैंने तो इंग्लिश मे एम्.ए. के दौरान भी नही पढा.)
मैंने अपना सिर उठाया.चेहरा सपाट. ना शर्म. ना झिझक, ना डर था अब मेरे चेहरे पर. मैंने उनकी आँखों के भीतर झांकते हुए कहा. ''एक मिनट सर! आप जो मुझे पढा रहे हैं क्यों ना आपकी पत्नी,बेटी और बहु को बता दूँ?उन्हें बुला लेती हूँ.उसके बाद जो पढाना है आप पढाइए आराम से.''
'' आंटी ! '' मैंने आवाज लगाई. फिर उनकी बेटी को 'नीलू दीदी !'
एक किताब मेरे पैरों के पास आ कर गिरी. सर ने झुकते हुए उसे उठाया.उनकी अंगुलियां मेरे पैरों को छू रही थी.
'सॉरी...सॉरी..प्लीज़...नही'- उनकी आवाज से घबराहट ,कंपकपी स्पष्ट झलक रही थी.
''क्या हुआ? मम्मी काम कर रही है उन्होंने शायद सुना नही.क्या हुआ भाभी ? आपने मुझे क्यों बुलाया?'-नीलम दीदी ने मुझसे पूछा.
'' दीदी ! पानी पिला दो''
'' सर! आप मेरे गुरु है और पिता के समान है. दा'साहब के मित्र भी हैं.किन्तु आप ???? क्या समझा था मुझे? बच्ची है ??यहाँ की बहु है इसलिए चुप रहेगी? आपकी बेटी के सामने मैं आपको दो कसके झापट लगा देती तो..???? मैं नही चाहती कि उसकी नजर मे आपका सम्मान घटे इसलिए मैंने उसे या उसके सामने आपको कुछ नही कहा.''
और.....मैं उठ कर आ गई.
काटिए मत ...अपनी सुरक्षा के लिए फून्फ़कारना भी गलत है क्या??? हो भले ही. . ऐसिच हूँ मैं तो और आप ? मेरे स्थान पर आपके घर परिवार की कोई महिला होती तब ????
