Pages

Thursday, 13 October 2011

पहल




नोएडा की दो बहनों की घटना तो सभी को पता है.ऐसा सब देख सुन कर मन विचलित हो उठता है.ये सब हो जाने के बाद हम भाषण देते हैं मिडिया,समाज,पड़ोसी,रिश्तेदार और...समाजसेवी.पर....हम सभी के होते हुए यदि ऐसा कुछ घटित होता है तो क्या हमारे लिए शर्म की बात नही.क्या करें?कुछ याद आया.यूँ हम भूल  चुके थे किन्तु आज बताऊंगी.आप कुछ भी सोचे...कहें.

एक दिन एक फोन आया -'' गोस्वामी भाभी! मैं मिसेज राय ...सुनीता राय बोल रही हूँ.आपसे बात करनी है'''' हाँ बोलिए सुनीताजी!'' मैंने जवाब दिया. ' देखिये सबसे पहले तो मुझे माफ कर दीजिए मैंने आपसे बिना पूछे मिसेज शर्मा को कह दिया कि वो आपसे अपनी बात कहे. आप उनकी जरूर मदद करेंगी'' '' कोई बात नही किन्तु उन्हें मेरी क्या मदद चाहिये और वो कौन है कहाँ रहती है?'' ''गोस्वामी भाभी! वो आपके सामने वाली लाइन में ही रहती है.कुछ समय से उनके पति जबर्दस्त डिप्रेशन में है.ना ड्यूटी पर जा रहे हैं. ना कुछ खाते पीते है ना बात करते हैं आप कुछ करिये'' दूसरों को क्या दोष दूँ मुझे नही मालूम कि मेरे पडोस में कौन कौन रहता है? बाहर निकलने पर बाते सबसे कर लेती हूँ किन्तु....कहीं आना जाना ???? हम दोनों पति पत्नी की बहुत बडी कमी,गलती है या मजबूरी जॉब के कारण.
गोस्वामीजी और मैं दोनों उनके घर गये.भाभीजी से बात की.उनकी बेटी और पति दोनों की मानसिक स्थिति सही नही थी.क्यों,कैसे ? ना पूछा? ना जानना चाहा. कोई यूँ ही डिप्रेशन में नही चला जाता. कई पारिवारिक कारण भी हो सकते हैं जिन्हें व्यक्ति किसी बाहरी व्यक्ति के साथ शेअर नही करता या नही करना चाहता. किन्तु शरीर की तरह मन और मस्तिष्क भी अस्वस्थ हो जाते है और इसका इलाज भी होता है. मानसिक बीमारियों का इलाज करवाने को लेके आज भी हमारा पढा लिखा वर्ग भी सतर्क नही है. 'हम पागल हैं क्या जो डॉक्टर को बताए?डिप्रेशन का अंत कितना भयानक हो सकता है ये पहले कोई नही सोचता,बाद में सोचते हैं.
शर्माजी रजाई से पूरी तरह लिपटे हुए थे.उनकी पत्नी ने उठाना चाहा.उन्होंने खुद को और कसके रजाई से लपेट लिया. जब हमने बहुत प्यार से उन्हें उठाना चाहा तो वे उठ कर पलंग पर दौड़ने लगे.हड्डियों का ढांचा मात्र,बड़े बड़े बाल,बेतरतीब बढ़ी दाढ़ी, एक महीने से ना नहाये न ब्रश किया था.उनकी हालत देख ...हम कांप उठे.क्या हालत बना ली उन्होंने खुद की !  एम्बुलेन्स बुलाई गई.बहुत मिन्नते की किन्तु वे तैयार ही नही थे.जबरन ले जाने की कोशिश करनी चाही तो उनकी पत्नी ने बताया कि बाईपास सर्जरी हुई है कहीं कुछ हो न जाए आप लोग जबरदस्ती मत कीजिये.'पास पड़ोसियों को बुलाया. वे आ गये किन्तु शर्माजी की एक ही रट थी 'नही जाना'और फिर रजाई ओढ़ कर लेट गये.सारे पड़ोसी लौट गये.हम दोनों बैठे रहे.मैंने धीरे से उनकी रजाई खींची.अचानक वे झापट लेके झपटे. गोस्वामीजी और शर्माजी की पत्नी कमरे से बाहर भाग गये.मैं डर तो बुरी तरह गई थी किन्तु उनके सामने बैठी रही.
''आप मुझे मारेंगे? मुझे मारने से आपको शान्ति मिलती है तो लो मार लो.''-मैंने कहा.''बेशर्म औरत !''- वो बोले.''बाहर आ जाओ तुम ! ये तुम्हारे लगा देंगे कहीं''-गोस्वामीजी ने आवाज लगाई.''जानांजी ! ये अपने होश में नही है.इनके कहे का क्या बुरा मानना''वे बहुत पूजा पाठ वाले आदमी हैं मैंने कहा- ''आपको भजन सुनाऊं? फिर आप मुझे डॉक्टर के पास ले चलिए मेरे हाथ में चोट लगी है.देखिये. 'ये' तो ले जाते ही नही है.'''मुझे भजन नही सुनना.और मैं क्यों ले जाऊं गोस्वामीजी ले जायेंगे आपको. मैं जीना नही चाहता.मरना चाहता हूँ''-शर्माजी ने कहा.''जानां जी ! देखो इनकी हालत अभी काबू में है.इन्हें ये मालूम है कि मैं गोस्वामीजी की पत्नी हूँ.मेरे हर प्रश्न का जवाब इन्होने उसी क्रम में दिया है.इसका मतलब है.हम पेशेंस से काम ले तो .....''....................................अगले दिन हम फिर गये.मुझे देखते ही वो उठ कर बैठ गये. सामने कुर्सी पर मैं बैठ गई. मैंने उन्हें भजन सुनने को तैयार कर लिया.कुछ भजन सुनाये.कुछ पूजा पाठ धर्म ध्यान की बातें की और घर आ गई. चार पांच दिन यही सिलसिला चला.वो मेरी तरफ देख कर मेरी बात सुनते.अब शांत भी रहने लगे थे. '' योगेश भैया ! आपने कभी भाभीजी के बारे में सोचा? अपनी बेटी के बारे में? '' ''मेरा कोई नही है.मुझे नही जीना.'' ''इतने लोग मरे ,दुनिया खत्म हो गई?उनके बिना रुक गई? जिन्दा रहते तो जाने कितने अच्छे अच्छे काम करते.ईश्वर से नजर तो मिला पाते.स्साले ना इधर के रहे ना उधर के.कायर थे सब जान दे देने वाले. आप तो इतना ईश्वर को मानने वाले हैं न? '' ............जाने किस बात ने असर दिखाया. नही मालूम यूँ भी इतना बक बक करती हूँ कि याद ही नही रोज क्या क्या बात करती थी.किन्तु...... वे तैयार हो गये. उनके भाई ,पिता को बुला कर समझाया कुछ दिन चित्तोड होस्पिटल में रहने के बाद वे अहमदाबाद इलाज के लिए भी तैयार हो गये.उनकी बेटी का इलाज भी शुरू हो चूका था. ...एक दिन मंदिर में मैंने एक व्यक्ति को पीली पगड़ी पहने अपनी पत्नी के साथ हवन करते देखा. किसी से पूछा.मालूम पड़ा कि ये शर्माजी है योगेश शर्मा जी.आश्चर्य! एकदम अलग लग रहे थे अब.हेल्द भी अच्छी हो गई थी.गोरे चिट्टे स्मार्ट-से. मैं जाने के लिए पलटी ही थी कि एक आवाज आई -'' भाभी जी!''  दोनों पति पत्नी मेरे पैर छूना चाहते थे कि मैं पीछे हट गई. ''क्या कर रहे हैं आप?' ''''मिसेज बता रही थी कि मैंने आप पर हाथ उठाया....मुझे माफ...'''''वो'  'ये' वाले योगेश जी नही थे....मार भी देते तो क्या फर्क पड़ता ? हा हा हा -मैंने ठहाका लगाया. किन्तु सच बताऊं उन्हें और उनकी बेटी को देख कर मन खुश हो जाता है.आत्मश्लाघा?? अरे ऐसिच हूँ मैं फटे में अपना पाँव फंसाने वाली. आप भी फंसाइए प्लीज़. बाकी ....कुछ हो जाने के बाद ....सब भाषणबाजी लगती है मुझे तो. किसी भी पूजा से ज्यादा सुकून मिलेगा ये सब करके सच्ची. कब तक हम यूँ निर्दयी बनके जियेंगे?

कल शर्माजी थे आज मेरा नम्बर भी तो हो सकता है न? और....भगवान ना करे आप.....का भी.