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Wednesday, 18 June 2014

बलद बेचना है?????

केरखेड़ी ही नाम है शायद उस गाँव का. एक बुढा किसान अपने एक बेटे के साथ रहता है .अब खेती के काम उससे नही होते.बेटे बहु को बहुत अखरने लग गया उसका बैठे बैठे रोटियाँ तोड़ना.लोक लाज का डर न होता तो कभी का बांह पकडकर बाहर निकाला होता.पर......गाँव में आज भी सामाजिक बंधन बड़े कडक हैं.
जात बाहर कर देना ,हुक्का पानी बंद कर देना भी इसमें शामिल है.
गलत जगह भी काम में ले लिए जाते हैं ये नियम कायदे पर.........कई बार बहुत काम भी आते हैं.
ये नही सोच सकते बुढापे में किसी बुजुर्ग का वृद्धाश्रम जाकर बाकी जीवन बिताने के बारे में .
शहरों में  वृद्धाश्रम यानि ओल्ड एज होम खुले हैं गांवों में आज भी नही है ये.


उस  दिन शायद कुछ ज्यादा ही तू तू मैं मैं हो गई थी बाप बेटे में. बेटा गुस्से में तो बाप दुःख से भरा था. कालजे की कोर को इसीलिए बड़ा किया था कि इस उम्र में रोटियों के लिए भी वो बेटे को भारी लगने लगेगा. एक पल के लिए सोचा कहीं चला जाऊँ,  पर........ कहाँ.आस पास के गाँव या चित्तोड भीलवाडा के सिवा और कहीं गया भी तो न था.
लुगाई जल्दी चल बसी.बेटे को पीठ पर लादे लादे जहाँ तक सफर कर सकता की. खुद का घर भी वापस नही बसाया.
.................................
तभी जाने कहाँ से एक मुटियार (नौजवान) पास आकर खड़ा हो गया. 'बा! एक बलदा (बैल) की जोड़ी मोल लेनी है.आछा तगड़ा बलद मीली कईं ई गाम में ?"(अच्छे तगड़े बैल मिलेंगे क्या इस गाँव में?)

'ये बुढो बलद है इन्ने ले जा '-जाट का छोरा गुस्से में बोल पड़ा.

'राम राम ! कसी(कैसी) बातां करे भाया !! थारा बापू है?'

'हाँ'

'बाप ने बळद बोल रह्यो है.  रे! म्हने पूछ माँ के पेट में हो और बाप मर ग्यो. चार बरस हो गया माँ भी चली गई. माथा पे हाथ फेरने वालो कोई नही रह्यो' बंजारे की आँखें छलक आई थी.

'तो तू ले जा '- जाट के छोरे की आवाज में गुस्सा तल्खी और चिढ़ थी.

' म्हने मुटियारपनों (जवानी) काट दियो इके (इसके) वास्ते.घर नही बसायो पाछो (वापस).घरवाली होती तो म्हारी या गत होती.... मौत भी नही आवे म्हने. बोझ बण गयो आज इप्पे (इस पर) रीस में भी कोई इसान (इस तरह) बोले? तुम ही देखो '-बंजारे की ओर भरी आँखों से देखकर बा ने बोला.

बैल खरीदना भूल गया बंजारा. समझाने लगा जाट के बेटे को. भीतर से बहु भी घूंघट में चिल्ला रही थी.

बंजारे ने बा को देखा.बोला- 'बा! बैठो मेरी गाडी पर. आज थां (आप)अपनों काम तो हाथ से कर रहिया हो, काले (कल) बिस्तर पकड़ लियो तो ये कांई सेवा करी थांकी (आपकी)?? ये ले पांच हजार रूपये कल ये मत कहना कि  फीरी(फ्री) में ले ग्यो '

बा चल दिए.बेटा बहु देखते रहे.एक बार भी नही रोका.न पूछा 'किस गाँव ले जा रहे हो?"
जानवर को बेचते समय भी ले जाने वाले का अता  पता पूछते हैं. उसके खाने पीने का ध्यान रखने का कहते हैं हम. कई कई बार कहते हैं.  पर बुढा बा  जानवर भी तो नही था ....नही पूछा.


अमल (अफीम) बोने का मौसम आया. जाट के छोरे के पैरों त्तले से जमीन खिसक गई.
पट्टा उसे नही बंजारे के नाम पर मिला था उसी जमीन पर अफीम बोने के लिए.
गाँव के मोतबीर लोगों को ले के पहले बंजारे का पता लगाया. फिर उसके घर जा पहुंचा. हट्टे कट्टे बंजारे से झगड़ने की हिम्मत नही जुटा सका.
हाथ पाँव जोड़े. सबने खूब समझाया. बंजारा भी अड गया.

'जमीन के लिए यहाँ थां (आप)सब  आ गया. जब डोकरा बा ने एक एक रोटी के लिए ये रुला रह्यो थो(था) वदी (तब) कट्ठे (कहाँ) चला गया थां सब ?जानवर ने भी आँखियों (आँखों) के सामने भूखा मरता नही देखा अपण. ये तो बाप थो रे इको (इसका)....मनख ..मनख (मनुष्य) है रे यो (यह)'-  बंजारे की आँखे और बोल आग उगल रहे थे.'

'ऐसा है कोर्ट में जाओ ,कचहरी में जाओ. थाणे में जाओ. मुझे किसी का डर नही.सब बा के साथ हैं. इतना क़ानून कायदा तो मुझे भी मालूम. तू जिस घर में रह रहा है न ! मैं न उसे खाली करवाऊँगा न गाय ढोरों के लिए चरनोट (चारागाह) और बाड़ा ही. यूँ बा ने सब म्हारे नाम कर दी है पर मैं तेरे जितना नीच कोणी '-बंजारे ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा.


मामला पुलिस तक गया.....और कोर्ट कचहरी तक भी.
इस बार पलड़ा बा का भारी था.
घर,परिवार अपनी इज्जत के नाम पर सब कुछ चुपचाप सहन कर लेने वाले बुजुर्गों में से एक आज विद्रोही हो गया था. नही चाहिए था उसे ऐसा बेटा.

'साब! ये म्हारो कुछ नही लागे. पर म्हने बाप से ज्यादा इज्जत दी बच्चा से ज्यादा म्हारी सेवा की. इसकी लाड़ी (बहु) बच्चा बच्ची 'बा बा ' करता नही थाके (थकते).मैं चुपचाप जाके म्हारा घर बार जमीन सब इके नाम कर दी. जदी (जब) माधु (बंजारा को एक नाम दे दूँ ) ने मालूम पड्यो (पड़ा) म्हारो लड्यो.की मैं इके नाम ये सब क्यों कर दियो? कलजुग में क्रिसन भगवान मिलिया म्हने (मिले मुझे)'- बा ने रोते हुए पुलिस वालों और गाँव वालों को कहा.

...................................और  एक दिन बा के बेटा बहु आये .पैरों में पड़ गए.  'बा घर चालो. अब कदी (कभी) अस्यो (ऐसा) नही करूँ. माफ कर दो.'

'बाप के लिए आयो है या जमीन जायदाद के लिए आयो  है?' बंजारा सांप की तरह फुन्फकारा.

'नही बाप के लिएईच आयो हूँ.गंगा माता की सोगंध '-जाट का छोरा,बहु आंसू बहा रहे थे.इस बार बच्चों को भी हथियार के रूप में आगे कर दिया.

बा नही पिघले. बंजारा पिघल गया. .
'ले जा बा को  अमल भी तू ही बो. मैं बिना बताए कदी भी थारे घर आ जाऊंगो.गाँव में भी पतो लगाऊंगो.जो मालूम पड़ गई कि तुने या थारे घर में कोई ने भी बा को दुःख  दिया... कोई कडवी बात भी बोल दी. तो....... तब न जमीन मिलेगी न बा. समझ ग्यो?'

'जमीन का कागज पत्तर ????' -छोरा बोला.

'बा के सौ बरस पूरे हो जाने के बाद तेरहवें दिन पूरे गाँव के सामने सब तुझे दे दूँगा.  इस बीच मैं मर भी ग्यो तो म्हारी घर वाळी म्हारा छोरा छोरी थन्ने (तुझे)दे देगा.पूरा गाँव के सामने कह रीयो (रहा) हूँ बंजारा की जुबान है.'
मैं  फिर एक अजूबा अपनी आँखों से देख रही थी.इस बार मेरे कृष्ण सीख देने आये थे बंजारा बनकर.....बा बनकर.
कैसी रही? क्या कहेंगे आप? ओल्ड एज होम्स की संख्याएँ घट सकती है न?????