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Sunday, 15 January 2012

' उसकी बातें '



मेरा छोटा बेटा बचपन में बड़े ही अजीब अजीब सवाल पूछता था. आज भी याद आते हैं या उनका ज़िक्र होता है,  हम  हँस  हँस  के लोट पोट हो जाते हैं .आम तौर पर बच्चे सवाल करते हैं ,पर  उसके सवाल..... ? 
आपको भी बताऊँ ? 
 घुंघराले घने घने बाल ,गोलमटोल सा आदित्य जिसे हम घर में 'ऋतू' कहते है ,बड़ा प्यारा सा था .बात तबकी है जब वो मुश्किल  से 
तीन साढ़े तीन साल का ही था .एक दिन कहीं से एक 'एग-शेल' ले के आ गया और बोला-'' मम्मी!देखिये मैं क्या लाया हूँ? मैं इस से खेलूंगा.''
मैंने कहा-''बाबा! ये कबूतर के अंडे का छिलका है .''
 '' कबूतर ने अंडे क्यों दिए?''
''इसमें से इसके बच्चे निकलते हैं.''
''बच्चे कहाँ है? ''
''बेटा! वो तो इसमें से बाहर आ गये. कबूतर  घोंसले को साफ रखने के लिए 'एग-शेल' को बाहर फैंक देता है '' - मैंने जवाब दिया.
''मम्मा! 'उसकी'मम्मी सफाई नही करती है? उसके  पापा ही करते है?'' ऋतू भाई साहब ने शायद मेरे ' फैंक देता है ' शब्द को पकड़ लिया था .
मैंने तुरंत जवाब दिया-'जब मम्मी बीमार हो जाती है,बाबा छोटा   सा होता है तब क्या पापा को सबका ,घर का ध्यान नही रखना चाहिए?वही कबूतर भी कर रहा होगा.''
अभी मैं कुछ सोचु एक प्रश्न और दाग दिया गया मेरी तरफ-'' मम्मा! मेरा छिलका कहाँ है? जिसमे से मैं निकला था,उसको पापा ने फैंक दिया?''
एक पल के लिए मैं सकपका गई .'' वो तो कबूतर है, हम तो इन्सान है .जिनके पंख होते हैं, चोंच होती है उसे 'पक्षी' कहते है, पक्षी के अण्डों  में से बच्चे निकलते हैं, देखो! मेरे तो पंख भी नही है, चोंच भी नही है , तो मेरा राजा बेटा अंडे में से कैसे निकलता?''
भैया जी बिना   कुछ बोले दौड़े ,मोहल्ले के बच्चों के पास पहुचे और चिल्लाये - ''मेरी मम्मी 'बर्ड' नही है वरना मेरे पापा को घोसले की सफाई करनी पडती"
ऋतू को सब बच्चों की तरह पिल्ले से खेलने का बड़ा शौक था ,उसकी बड़ी ताई के घर के पास एक 'डीप' खड्डे में कुतिया ने बच्चे दिए थे चूँकि बच्चे बहुत छोटे छोटे थे ,आँखे भी न खुली थी उनकी ,तो अंदर ही रहते थे .
ऋतू रोज जा के उस खड्डे में टाँगे लटका कर बैठ जाता और बच्चो को देखता रहता था, रोटियां,ब्रेड ले जाता और कुतिया को खिलाता था, दोनों के बीच एक अनजानी- सी पर प्यारी- सी दोस्ती हो गई थी इस लिए हम भी नही डरते थे उसके कुतिया के पास जाने पर.
एक दिन बहुत देर हो गई वो घर नही आया ,मुझे  चिंता होने लगी मैंने इन्हें कहा 'आप जा के देखिये वो  जीजी(ताईजी) के यहाँ  है या वहीं बैठा है?''
जब ये भी देर तक नही आये मैं बड़ी चिंतित हुई और उस  तरफ चल दी.देखा वो उसके चचेरे भाई बहिन,ताईजी ताऊ जी सब वहीं खड्डे के पास खड़े हैं मैं समझ गई कि जरुर इसकी बातों का मजा ले रहे होंगे , मैं तो खुद बड़ी बातूनी ,पहुँच गई.
मुझे देखते ही ऋतू बोला -'' मम्मा ! देखो कितने छोटे छोटे प्यारे प्यारे बच्चे हैं.  है ना ?''
'' तुम भी इतने ही छोटे और प्यारे प्यारे  थे '' मैंने उस से  कहा .
''तो मैं खड्डे में से बाहर कैसे आया ? '' उसका अगला सवाल मुझसे टकराया .
हर बात का तुरंत जवाब दे के अपने बच्चों की जिज्ञासा का समाधान करने वाली 'इंदु पुरी' ............
ये बच्चे और ये इनके सवाल ! कितनी प्यारी दुनिया होती है न  इनकी ?