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Sunday, 15 January 2012

नन्हा सा एक दिया-'मयूरी'

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( फोटो में ...........मयूरी और दामाद जी )

सुबह सुबह दो तीन ब्लोग्स पर गई ,सब जगह 'मन उदास  है' लिखा हुआ पढा .
बाबा रे! मन ना हो गया 'देवदास' हो गया .
अब इस 'देवदास को सुख या दुःख की कितनी मदिरा पीने देनी है ये तो हम को मालूम होना चाहिए ना ? 'चन्द्रमुखी' बनके सख्त न हुए, मनमानी करने देंगे तो खुद तो डूबेगा हमें भी कहीं का ना छोड़ेगा .
हा हा हा 
अब अपनी तो  जीने की स्टाईल यही है .
स्साले सुख हो या  दुःख ? सुख को खूब इंजॉय करते हैं और दुःख को ?
हावी नही होने देते अपने पर. कई बार ऐसा हुआ जब 'हिल कर' रह गई ,पर...........
ऐसा कोई दुःख है जो बिजली बन हमीं पर टूट पड़ा हो और हम से पहले किसी ने उसे फेस न किया ?
नही, वो हमसे पहले कईयों को आजमा चूका होता है
क्या किया लोगों ने ऐसे में ?
दो तरह के उदाहरण मिले .एक जब उस स्थिति में व्यक्ति ने पलायन का रास्ता चुना .
दूसरा जब उसने उसी दुर्भाग्यपूर्ण या बुरी स्थिति का बहादुरों की तरह सामना किया .
एक ने मौत का रास्ता चुना ,बाद के सुख देखने को रहा ही नही.
दूसरे ने सामना किया और वो पल बीत गए .


मैंने हमेशा ऐसे समय में दूसरा रास्ता चुना और उस व्यक्ति को, उस घड़ी को, अपना 'रोल मोडल' बना लिया .
हा हा हा 
और बता दिया जिंदगी को, उस परिस्थिति को  कि तेरा सामना 'इंदु पुरी' से हुआ है जो अपने पापा और ईश्वर की लाडली बेटी है और अपने बाप को कभी शर्मिंदा नही होने देगी कि उन्होंने एक कायर को जन्म दिया था.
अरे ! ऐसे जियेंगे न कि जब जायेंगे तो अपने ' दोनों बाप ' कहेंगे -'ओ ! मेरा लाडला बेटा आ गया तू?' और पास बुला कर पीठ थपथपाएगा .
हर व्यक्ति गांधी,मदर टेरेसा नही बन सकता पर एक अच्छा इंसान बनने की कोशिश तो कर ही सकता है न ? और 'कायर' कैसे अच्छे इंसान हो सकते हैं? वो तो कायर ही होते हैं. 
इन  सब को फेस करने के लिए सबसे पहले उदास, रोवने गाने सुनना बंद कर दीजिए .
ये आपको डिप्रेशन की स्थिति में पंहुचा सकते हैं .
और......................
छह सात साल पहले मेरे इकलौते जवान भतीजे की अचानक मृत्यु हो गई ,
हट्टाकट्टा ,गोरा चिट्टा ,स्मार्ट,डेशिंग पर्सनालिटी ,छब्बीस साल का,चित्तोड शहर मे उस जैसा देखने को नही मिलता .भीड़ में दूर से अलग दीखता था,इतना प्यारा .
शादीशुदा एक बेटे का पिता. बिजली गिर पड़ी .पर..................
 बारह दिन बाद भाभी की बहिन ,जीजाजी,इकलौता दामाद,भांजी और उनके कुछ रिश्तेदार 'अंकलेश्वर' लौट रहे थे .

रास्ते में अचानक भयानक दुर्घटना हुई, उनकी गाड़ी बस से जा भिडी. तीन व्यक्तियों की  घटना स्थल पर ही मौत हो गई .तीनों -भाभी की बहिन के देवर,ननदोई और स्वयम बहिन की  ... और जीजाजी ,दामाद, भांजी, ड्राईवर बुरी तरह घायल हो गये कोई भी होश में नही था. भांजी मयूरी को जब होश आया उसने सबको लहुलुहान हालत में देखा, माँ आँखों के सामने अंतिम साँसे ले रही थी. मोबाइल छिटक कर दूर जा चुके थे, रहे सहे मदद के नाम पर आये लोगों ऩे ......
अपने पापा की जेब से सेल फोन निकाल कर उसने इमरजेंसी सर्विस के लिए उपलब्ध एम्बुलेंस सर्विसेज़ को फोन लगाया, सब घायलों की जेबों में से केश,क्रेडिट कार्ड, ए.टी .एम.कार्ड्स,घडियां ,जेवर निकाल कर अपने पर्स मे डाले.  जरा सी देर देख कर उसने लोगों से मदद मांगी और उसी शहर -अहमदनगर था शायद-के हॉस्पिटल में सबको पहुँचाया. इस बीच उसने भाभी को और अपने रिश्तेदारों को भी फोन लगाया .
माँ की की 'बोडी' उसी हॉस्पिटल में छोड़ तुरंत सभी को ले के 'साल' होस्पिटल पहुंची. 
उसके खुद के हाथ और कोलर बोन में फ्रेक्चर था .
सभी को तुरंत भर्ती कराया और इलाज चालू कराया .
उसकी हिम्मत से उसके पापा ,जीजाजी, एक चाचा , एक फूफा और ड्राईवर की जान बच गई .मयूरी -जो बीस इक्कीस साल की बच्ची ही थी अपने पापा  के ओपरेशन के जस्ट बाद में थियेटर से निकलते ही पूछने पर कि ' तेरी मम्मी कैसी है ?'
मुस्करा कर कह रही थी -' पापा ! थेंक गोड , आप लोगों को ज्यादा चोट नही आई,मम्मी के तो जरा सी लगी है .

उस वक्त उसकी मम्मी का पोस्ट मार्टम चल रहा था.
हम जब उसके पास पहुंचे ,वो अपने छोटे भाई को समझा रही थी बार बार -'देख ! अपनी मम्मी की इतनी ही उम्र थी,हमारा चेहरा देख कर हमारे पापा समझ जायेंगे.वो भी मर जायेंगे. चुप. एकदम नोर्मल रह.'फेस' तो अपन को करना ही है न, तू तो बहादूर है मेरा भाई  ?' 
हम दंग रह गये उस बच्ची की हिम्मत देख कर .
होस्पिटल से  सीधे हम अंकलेश्वर पहुंचे.
तीनो का अंतिम संस्कार किया. तुरंत 'साल' होस्पिटल पहुंचे जहाँ तीन अलग़ अलग़ मंजिलों पर छः घायल भर्ती थे . मयूरी अपने पापा के सामने जा कर फिर मुस्करा रही थी -''आप अपना ध्यान रखिये.मैं हूँ ना मम्मी के पास .एक दो दिन में उनको आपके पास  ला कर मिला दूंगी,वो बहुत घबरा गई है आपको इस हाल में देखेगी तो............''
मयूरी  के पापा ,मेरी  भतीजी के पति एक साल तक बेड पर रहे .पर....मयूरी?

जीना और बहादुरी से जीना सिखाते हैं ऐसे लोग .
कहते हैं औरतें रो रो कर माहौल को और गमगीन कर देती है आदमियों को 'कच्चा पटक' देती है, कमजोर कर देती है.
पर क्या कहेंगे इसे?
इस बच्ची के लिए ?
मैंने उसे गले लगा कर प्यार किया और इतना ही कह पाई  -'हमें गर्व तुम पर है,  तुम्हारी हिम्मत पर !'
ये जीवन है. ये हम पर है हम कैसे जीते और कैसे उसका सामना करते हैं?

कुछ कहना चाहेंगे आप ?