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Saturday, 17 September 2011

तीन बच्चे और वो औरत

बहुत उदास और 'डिप्रेस' सी रही कुछ दिन. यकीन नही कर पा रही थी कि कोई बिमारी 'मुझे' भी घेर सकती है. यूँ कोई भी इस सच को उसी तरह स्वीकार नही करता जैसे अपने किसी प्रिय की मौत के बारे में सोचना भी नही चाहता.
खुद को ऐसी  स्थिति से हमे निकाल सकता है कोई  तो शायद वो खुद हम  ही है.
जिंदगी ने  क्या क्या बुरा किया इस से ज्यादा क्या क्या अच्छा हुआ वो सोचना शुरू किया और....
कई ऐसी छोटी छोटी बातें याद करनी शुरू कर दी जो मेरे चेहरे पर एक मुस्कराहट बिखेर दे.
और पाया अरे! ऐसे पल ज्यादा गुजारे हैं मैंने.  बस उन्हें याद ही नही किया, पलट कर देखा ही नही उन्हें.
ज़िन्दगी बरसों में जीना शुरू कर दिया था...पलों को भूलती गई थी. मेरी 'उस' स्थिति का कारन यही था.
बताऊँ वो 'पल' जिन्हें याद करके मैं अभी भी मुस्करा रही हूँ.
                                                                १
 अमेरिकन हॉस्पिटल, उदयपुर. एंजियोप्लास्टी के दो तीन दिन बाद डॉक्टर  ने कहा मैं घूमना शुरू करूं.
हॉस्पिटल के उस वार्ड के बाहर ही मैंने घूमना शुरू कर दिया
छोटी बहु डोली ने एक ओर इशारा करते हुए  कहा-'' माँ! देखो वो बच्चे शायद रो रहे हैं ''
हम दोनों  पास गये. देखा. स्ट्रेचर  पर एक महिला अधलेटी अवस्था में थी. एक आदमी और तीन बच्चे उसके पास खड़े थे.
''मम्मी! मैं कौन हूँ? मम्मी ! मैं कौन हूँ.बताओ''- एक बच्ची जो लगभग आठ नौ साल की थी अपनी मम्मी से पूछ रही थी.
मैं कांप उठी. उस एक वाक्य ने पूरी बात बता दी.  जान न पहचान ...पर ....मैंने आगे बढकर तीनों बच्चो को अपनी बाहों में समेट लिया. मैंने महिला के पास जा कर बोला-
''हेलो''
साथ खड़े व्यक्ति ने महिला का सिर पकड़ कर  मेरी ओर घूमा दिया. सपाट भावशून्य चेहरा.एक तरफ से टेढा. तीस बत्तीस की उम्र.
''आप मेरी बात सुन रही हैं तो अपनी अंगुली हिलाइए.'
अंगुली हिली.  उनके पति, तीनो बच्चे, डोली और मैं ख़ुशी से चहक-से गये.
एक सप्ताह पहले  अचानक जब उस महिला की नाक और कान से से खून बहने लगा. ब्रेन की एक नस फट गई थी. मेडिकल जांचों से पता चला उस महिला को ब्रेन - ट्यूमर भी था.  आज उनके मस्तिष्क  का ओपरेशन था. 
''आपको कुछ नही होगा. आप एकदम अच्छी हो कर घर जाएँगी अपने. देखिये आपके बच्चे, आपके पति और.....मैं भी आपका इंतज़ार कर रहे हैं.जल्दी जाइए और जल्दी आइये फटाफट.''- मैंने मुस्करा कर अपने अंगूठे को उपर उठाते हुए  उस महिला को कहा. 
बच्चे अब भी मुझसे लिपटे हुए थे. महिला के चेहरे पर कोई प्रतिक्रिया नही हुई.पर....उसके हाथ का अंगूठा हिला.वो भी अंगूठा उठाना चाहती थी शायद.
बच्चों को एकदम करीब ले जाकर मैंने फिर कहा.-''अपनी पलको को झपकाइये तो जरा. बच्चे समझ जायेंगे कि आप कह रही हैं 'बेटा! मैं अभी आती हूँ' ''
पलके झपकी. उस महिला के पति और दोनों बेटियों की आँखे छलछला आई. बेटा बहुत छोटा था. इन सबसे बेखबर.
'मेडम ! आज पहली बार इसने कुछ रिस्पोंड  किया है' -उस आदमी की आवाज जैसे ....बर्फ पिघली.
 पन्द्रह दिन बाद जब मैं वापस होस्पिटल गई. मैं जानना चाहती थी कि 'वो' अब कैसी है? किन्तु मैंने उनमे से किसी का नाम नही पूछा था. कहाँ से आये थे यह भी नही मालूम.
पर...पता लगा लिया.उस दिन मात्र तीन ब्रेन के ओपरेशन हुए थे.जिसमे दो पुरुष के हुए थे.
डॉक्टर ने बताया कि 'ओपरेशन सफल रहा. धीरे धीरे हालत में सुधार हो रहा है.बहुत जल्दी वो एकदम अच्छी हो कर अपने घर चली जायेंगी.आप चाहे तो उनसे  मिल सकती है'   
मैं नही गई. कल्पनाओं में उस महिला के बच्चे और पति के खिलखिलाते चेहरे देखती हूँ. वे अब उदासी भरे नही दीखते होंगे न? वो भी जरुर मुस्कराती होगी उन्हें देख कर.और...अब अपने अंगूठे को उपर खुद उठा भी लेती होंगी.
मैं एक सुकून महसूस करती हूँ.और मेरे होठो के छोर मेरे कानो को छुए जा रहे हैं .