Pages

Sunday, 6 May 2012

गुंडा-पार्टी

बज़ पढते हुए अचानक एकदम भूली सी एक बात याद आ गई.बताऊँ? उन दिनों हमने चित्तोड के गांधी नगर इलाके मे नया घर खरीदा.शहर के बीचो बीच. छोटा-सा मात्र दो बेडरूम, हाल वाला वो घर खूबसूरत था.
सामने एक बगीचा.. नही. बगीचे के नाम पर जमीन थी जिसके चारों ओर बाउंड्री बना के नगरपालिका ने छोड़ी हुई थी. पहली सुबह उठते ही उसका उपयोग सामूहिक शोचालय के रूप मे हम दोनों ने  देखा.
चौड़ी चौड़ी नालियां कीचड से भरी हुई बदबू मार रही थी.

मैंने पास मे रहने वाली बुजुर्ग दादीजी से पूछा-'कितने साल से रह रहे हैं यहाँ सब?'

'' पन्द्रह बीस साल तो हो गये होंगे दीदी!''   (दादीजी आज भी मुझे 'दीदी' ही बुलाती है. जाने क्यों?)

''इतने साल?????''- मैंने आश्चर्य से कहा.''इतने सालों से सब रह रहे हैं.किसी ने सामने वाली जमीन,खराब सड़क और 'इन' नालियों के लिए कभी नगरपालिका को शिकायत नही की?'

''कौन कहे? कभी कभी ललित जाता है तो आ के कर देते हैं बाकि ना कोई कुछ बोलता है ना कोई काम होता है''-दादीजी ने जवाब दिया.

मेरे भतीजे के कुछ मित्र मेरे घर के सामने से निकलते ' नमस्ते बुआ! ' बोलते और चले जाते मेरे भतीजे अविनाश से मिलने.
ये सब कोलेज मे पढ़ने वाले या कोलेज से पढाई पूरी करके निकले युवक थे. सब बेरोजगार.
एक जगह इकट्ठा होना, हँसी ठट्ठा करना. आते जाते को देखना, फब्बतियाँयाँ कसना इनका रोज का काम था.
एक दिन मैंने सबको रोका. बातें की. उनके बारे मे सब पूछा.

''डांस करने का शौक है''- मैंने सबसे पूछा.

''हाँ बुआ ! बहुत है,  ये 'श्यामू'  बहुत अच्छा गरबा कर लेता है''

''तो इस साल अपन सब गरबा करेंगे''-मैंने कहा.

''पर कहाँ? जगह तो है नही, करेंगे कहाँ? ''-शायद मनोज ने पूछा मुझसे.

'' लो, सामने इतनी जगह तो खाली पड़ी है और है भी कोलोनी के एकदम बीच मे , बहुत मजा आएगा. जो आना चाहे आये, नही तो घर से भी देख सकेंगे'- मैंने जवाब दिया.

''ये एप्लीकेशन' नगरपालिका मे दे आओगे. अपने अपने सिग्नेचर भी कर दो और...........अपने पापा,मम्मी,पास पड़ोसियों के भी.''


''तो 'ये' भी पहले से तैयार कर रखी है ....बुआ ! आप हो बहुत 'शानी'  है .पर.....कुछ नही होगा. कोई नही करता यहाँ काम. मैं कई बार गया हूँ. नगर  पालिका का बाबु इसे ले के अपने पास रख लेगा बस.  बुआ! ......  ''

''कितने लोग हो तुम? आठ. अविनाश को भी ले लो. मैं भी चलती हूँ. सीधे नगरपालिका अध्यक्ष से मिलेंगे. एक बार मे काम नही होगा तो दुबारा चलेंगे, तिबारा...बार बार.   एक कागज ही तो लगता है. हम मे से कोई भी नगरपालिका के सामने से गुजरता हो. एप्लीकेशन लेता जाएगा. रोज एक एप्लीकेशन पकड़ायेंगे नगरपालिका अध्यक्ष को ही'' मैंने उन्हें समझाया.

दुसरे ही दिन नगरपालिका की एक गाडी  -पे लोडर- आई. जंगली पौधे,घास फूस हटा के चली गई.
हमारा सार्वजनिक शोचालय  यानि बगीचे का सुबह सुबह होने वाला उपयोग भी बंद हो गया.
 सप्ताह भर के अंदर लोगों ने नालियों के साफ़ पैंदे बरसो बाद देखे.
कई नवयुवको को हमने अपनी टीम मे जोड़ लिया.लडको की इस टीम को मैं 'अपनी गुंडा पार्टी' कहके बुलाती थी और उन्होंने मुझे नया नाम दे दिया 'डॉन'

सबने  अपने अपने एरिया के विकास के लिए भी काम करना शुरू कर दिया.
मात्र छह महीने के अंदर गांधी नगर मे नई सडके,थम्बो पर लाइट्स, साफ सुथरी नालियां दिखने लगी और.....बगीचों मे पौधे दूर से दिखने लगे थे. दुसरे बगीचों का नही मालूम किन्तु मेरे घर के सामने वाले बगीचे मे फव्वारे,झूले,फ़िसलपट्टी,बैंचे बड़े बड़े  डूम-बल्ब भी लग गये.

गरबे हुए.पेरेंट्स अपनी युवती बेटियों को रात दो दो बजे तक मेरे सामने वाले बगीचे मे गरबा करने के लिए भेज देते थे. जरा सी हरकत देखते ही मैं आ जाती और कहती- ''गरबा करना है? चलो मेरे साथ करो''
कोई लड़का अपनी हरकतों से बाज ना आये तो एक तरफ ले जा कर 'उसे' अहसास करा दिया जाता था कि यहाँ वे लडकियां है जिनके पेरेंट्स 'गुंडा पार्टी' और उसकी ' डोन' पर भरोसा करके भेजते हैं.
हर गरबा क्षेत्र मे एक पुलिस वाले की ड्यूटी लगती थी. हमारे एरिया मे जिसकी ड्यूटी लगती वो निश्चिन्त होके शायद सो जाता था या घर चला जाता होगा.

आज सब बच्चे कहाँ है ? नही मालूम. कभी मार्केट मे मिल जाते है या फोन आता है, तो इतना जरूर बताते हैं कि वे जहाँ भी रहे या रहते हैं  कम से कम अपने एरिया के विकास के लिए समय निकाल ही लेते हैं.

 मेरे गुन्डा पार्टी का हर सदस्य जहाँ भी रहेगा मैं जानती हूँ वो हर जगह एक गुंडा-पार्टी बना लेगा और....
इतना तो हम कर सकते हैं ना? या कोसते रहेंगे सरकार को कि हमारे यहाँ कुछ नही होता. क्या यह देश सिर्फ सरकार या सरकार चलाने वालों का है??? सोचिये  हा हा हा
(कृपया स्वयम एडिट करके पढे हा हा हा स्कूल का समय हो गया है भई)





11 comments:

  1. जब तक खुद पहल ना करो कोई क्रांति नही आती।

    ReplyDelete
  2. इतना तो हम कर सकते हैं ना? या कोसते रहेंगे सरकार को कि हमारे यहाँ कुछ नही होता. क्या यह देश सिर्फ सरकार या सरकार चलाने वालों का है???
    यहां के नागरिक जिम्‍मेदार नहीं .. दोष दूसरों को देते हैं !!

    ReplyDelete
  3. क्रांतियाँ ऐसे ही जन्म लेती हैं, आपकी गुंडा पार्टी बड़ी गजब थी और उनकी "डॉन" भी :)

    ReplyDelete
  4. इंदु दीदी प्रणाम ,
    बढ़िया एवं सार्थक लेख

    ReplyDelete
  5. काश आपकी तरह ...एक गुंडा पार्टी अपनी भी होती ....पर ऐसा मौका कभी आया ही नहीं शायद ....

    ReplyDelete
  6. आज की साधू-वाद पार्टी से .....ये आप की गुंडा-पार्टी ज्यादा कारगर होगी ....
    मुबारक हो !

    ReplyDelete
  7. Spot on with this write-up, I really think this website wants far more consideration. I'll probably be again to learn way more, thanks for that info.
    HTTP://www.CoolMobilePhone.net

    ReplyDelete
  8. एकदम सही बात। हर कॉलोनी में ऐसे गुंडे और गुंडापार्टी की आवश्यकता है। हमारे कॉलोनी में भी बहुत सुधार हुआ है और आगे करना शेष है। वन विभाग से वृक्ष लग चुके हैं, छोटी-छोटी कॉलोनियों के जोड़ने वाली मुख्य सड़क, स्ट्रीट लाइट लग चुकी है। यह सब कॉलोनी के ही बच्चों ने किया है। हम सोये रहेंगे तो सरकारी योजना का बंदरबाट तो हो ही जायेगा। सरकार की नहीं हमारी भी जिम्मेदारी बनती है कि कुछ समय अपने पास-पड़ोस को दें।

    ReplyDelete
  9. उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवार के चर्चा मंच पर ।।

    ReplyDelete
  10. वाह !
    अपनी अपनी कार्यशैली
    गुंडा पार्टी को लगा दे
    कोई देश निर्माण में
    देखे जाते है जहाँ
    ज्यादातर करते हुऎ
    उपयोग ऎसों का
    अपने अपने कल्याण में!

    ReplyDelete
  11. बहुत अच्छा आलेख अगर बच्चों को विशवास में लेकर सही निर्देश और सलाह दी जाए तो बच्चे बहुत शोंक से आगे आ जाते हैं आपकी गुंडा पार्टी का जबाब नहीं बहुत रोचक लगी आपकी यह पोस्ट

    ReplyDelete