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Sunday, 21 October 2012

साये -यादों के

नाजुक चूजा समझ लिया मेरे एक कुलीग ने मुझे, पर मेरे लिए उनका  चिंतित होना मुझे अच्छा लगा.

                                      
                         अनुभव-१
आदेश आया,  जनगणना में मेरी ड्यूटी लगी है . एक सर ने फोन किया-'मेडम ! आपको 'ये' काम करना है आप नही कर पाएंगी.कुछ टीचर्स हैं, वो कर देंगे. आप उन्हें पेमेंट कर देना और सिग्नेचर' कर देना, बस.'
'क्यों नही कर पाऊँगी?' -मैंने सवाल किया .
' मेडम! आप ए.सी. में रहने की आदी हैं, धूप में घर घर भटकना पडेगा. परेशान हो जाएँगी'
'थेंक्स कि आपको मेरा इतना ख्याल है,बाईस साल की सर्विस में मैंने 'ना' कभी नही की  और ना ही ड्यूटी चेंज करवाने के लिए किसी को कहा.मैं कर लूंगी.'
'पर आप जिद क्यों कर रही हैं?  ड्यूटी चेंज करवा लीजिए'- वे फिर बोले.
' मुझे पैसा चाहिए स्कूल के लिए एक सेकेण्ड हेंड फ्रीज़ और माइक्रोवेव अवन खरीदना है वो भी अपनी इस मेहनत की कमाई से. सेकंड,  मैं ही ऐसा करूंगी तो मेरे टीचर्स को भी एक रास्ता मिल जाएगा कि सिफारिश लगवाओ और ड्यूटी चेंज कर लो. मैं बिना मुँह से कुछ बोले उनके सामने एक एक्साम्पल रखना चाहती हूँ कि विशेष परिस्थिति आ जाये तो बात अलग वरना नौकरी करनी है तो उसमे 'नही कर सकती' शब्दों को कभी काम में नही लेना है. बाकि  चिन्ता ना करिये टाटा बिरला नही हूँमैं.  साधारण परिवार की एकदम  साधारण सी औरत हूँ मैं सर! '- मैंने फोन रख दिया.

                                                                       अनुभव-२
           
आपका नाम ?
'हंगारी बाई '
हंगारी या श्रृंगारी ?'
'नही सा हनगारी '
कितने बच्चे है आपके?
क्यों आपको क्या? किस लिए लिख रहे हो ? हमे क्या मिलेगा? सरकार! इन्द्रा  आवास का घर बनवा दो,मेहरबानी होगी '
''अम्मा! हम अपने देस में कितने मनख है औरते और आदमी बस उनकी और घरों की गिनती का काम कर रहे हैं. अच्छा पोते पोते पोती कितने हैं? सब साथ रहते हैं या अलग ?'
' मेडम जी ! आप तो लोग लुगाइयाँ(आदमी औरत) गिन रहे हो, मेरे पोते पोती तो अभी बच्चे हैं.''
    मेरी हंसी छूट गई .मैंने सही तरीके से समझाया नही था. बच्चे आदमी औरत कैसे हो सकते हैं ? वो तो बच्चे हैं.
                                                                                    अनुभव-३

        ' प्रभु दास जी!  आपकी उम्र क्या है? '
  'मुझे क्या मालूम? आप ही देख लो'
आपकी बेटी कविता का जन्म ६ फरवरी १९९७ का है,वो आपकी  शादी के कितने 
 साल बाद  जन्मी थी?'
 'मुझे क्या मालूम ? इसकी माँ से पूछो.'- बंदे ने झट से जवाब दिया .
  'भाभी ! कविता ....?
 '  शादी के  चार,पांच,छः  साल बाद हुई होगी ' प्रभुदास जी की पत्नी ने उत्तर दिया. 
          '  आपकी शादी हुई तब आपकी उम्र क्या थी ?'
   'मेडम जी! मैं आपके कान तक आती रही होऊँगी तब '
      अब ये मेरा काम था कि कोई मेरे कान तक आता हो तब उसकी उम्र कितनी हो सकती  है? ये मैं  खुद हिसाब लगाऊँ.  भगवान की और ऐसे ही लोगों की कृपा से इस सवाल का सामना तो हर घर में करना पड़ा. उम्र का हिसाब लगाना बड़ी ही टेढी खीर साबित होता रहा. पर............हम इंजॉय कर रहे थे.
                                                                           अनुभव -४

                                 ..........आपके पति का नाम ?'
                                          उम्म् ....वो सोचने लगी. एक बच्चे को बुलाया .-'तू बता'
                                            'अभी वाले का या पहले वाले का?  बच्चे ने महिला से सवाल किया.
                                             ' अबार (अभी) वाला को रे ' -  महिला ने बच्चे को झिड़का .
                                              'रत्तू राम '  अब जैसा उसने बताया हमने लिख दिया, इससे पहले की और सवाल पूछे वो बकरियों के पीछे दौडी .हमने सोचा वापस आ ही रही होगी,किन्तु वो जा चुकी थी. हमारे गाँव की सरपंच चुनी गई है फिलहाल  वो मोहतरमा .
पांच सात दिन बाद  मिली.  'मेडम जी ! मेरे घर वाले का नाम मदन लिख दो ,नही तो दस्खत नही करूंगी. सरपंच बनने के बाद वो इतना तो सीख ही चुकी थी.
दूसरा फार्म भरा गया. दस दिन बादवो वापस आई .
              ' आओ काली बाई! क्या हुआ ? अब तो दूसरा फार्म भी भर दिया दस्तखत कर दो'- गरिमा,सुविधि मैंने सबने समझाया .
(वैसे वोटर्स लिस्ट का काम करते समय गरिमा मेडम  भी काफी अनुभव प्राप्त हो गए थे. काली बाई  जो पहले 'डाली बाई' थी, उन्होंने  पति का नाम 'बाबु लाल' भी लिखवाया  था दो महीने पहले ही)
वो बोली-'मेडम जी ! मेरे घर वाले का नाम 'नन्द राम' लिख दो. और छोरों के नाम भी बदलने हैं '               हम चौंके. मैंने फोन उठाया एक स्थानीय नेता को फोन लगाया -' अरे राजा राम जी !  ये सरपंच का फार्म जब भरा गया था तब इसके पति का क्या नाम लिखवाया था आपने ? और उम्र भी बता दो .'
मैंने गरिमा को कहा -''इससे पहले की इसका पति फिर बदल जाये जल्दी से फॉर्म पर सिग्नेचर या अंगूठा लगवा लो, बाद में भले ही वो कितने ही पति बदले. अपन तो बार बार फॉर्म बदलने से बचेंगे. खराब फॉर्म भी जमा करवाने है.इस बार तो.'
                                                                            अनुभव -५
  स्थान  कच्ची बस्ती एरिया -आदित्य सीमेंट कम्पनी के सामने(यानि मेरे घर के नजदीक ही .हम स्टाफ कोलोनी क्वार्टर्स में रहते हैं)
  धूप से बचने के लिए हम सूर्यास्त के बाद ही निकलते थे .
  दुकानदारों ने कहा -'मेडम! आप मत जाइये इस एरिये में अभी '
 'मैं हंसी और बोली -'थेंक्स ! आप मेरी सुरक्षा को लेके इतने चिंतित है. कुछ नही होगा मुझे. फिर आप लोग है ना, मुझे किस बात का डर?'
एक घर के सामने पहुंची. बिटिया और गाँव का ही एक नवयुवक समुद्र सिंह जाट मेरे साथ था .
 घर के बाहर चार पांच आदमी बैठे थे और कुछ बच्चे खेल रहे थे.
  सामने शराब की बोतल और कुछ गिलास भरी हुई रखी थी. उन्होंने धीरे से बोतल और गिलास एक तरफ खिसका दी .
'' ले रहे हो?  लो.कोई बात नही बस मैं जो पुछू उसका जवाब दे दीजिए एकदम सही सही.''
  घर मालिक ने बड़े सलीके से एक एक बात का जवाब दिया और पूछा -'' आपकी क्या मनुहार करूँ मेडम जी ! घर वाली छः लडको को छोड़ कर चल बसी, लड़की चाहिए थी उसे. सबसे छोटा तीन साल का. उससे बड़ा पांच साल का,उससे बड़ा..........सबमे दो दो साल का अंतर है साहब. ये मेरा ' कारड' जन्म तारीख इसमें लिखी होगी मुझे तो 'बांचना' आता है नही. बच्चे भी नही पढे. चाय मंगवाऊं? ''
''नही, मैं चाय नही पीती, आप परेशान मत होइए. आपने जिस प्यार और अदब से मेरी हर बात का जवाब दिया मेरे लिए वो ही सबसे बड़ी मनुहार बा'साहब !'' मैंने जवाब दिया और मुस्कराती हुई आगे बढ़ गई.


                                                                       अनुभव ६

          
    एक बड़ा सा पक्का  घर. बाहर कई लडके बैठे हुए. पूछने पर पता चला किसी कोंट्रेक्ट कम्पनी के लोग है जो आदित्य कम्पनी में मजदूर सप्लाई करने का काम करती है खास कर जब कोई बड़ा निर्माण कार्य चल रहा हो.  बड़ी ईमादारी से उन्होंने बतलाया कि अधिकाँश दो चार दिन में जाने वाले हैं. जो दो दो साल से वही रह रहे थे और लम्बे समय तक स्थाई रूप से वहीं रहने वाले थे. उनके फॉर्म भर कर मै आगे बढी.
उसी घर का बीच वाला हिस्सा अँधेरे में डूबा हुआ था जबकि बाहर उन युवको के कमरों में लाइट्स जल रही थी. थोडा आश्चर्य हुआ मुझे. उन लड़कों ने बताया कुछ  लडकियां किराये पर रहती है.
''हेलो कोई है? कोई है अंदर? '' मैंने आवाज लगाई. कोई जवाब नही आया.
मैंने समुद्र को कहा - ' समंदर बेटा! जरा आवाज दे  तो अंदर जा के . ये लडके बता रहे थे कुछ लडकियां किराए पर रहती है. यहाँ '
  एक लड़की बाहर आई. पहनावे से देखने में आदिवासी लग रही थी.एकदम साफ़ सुथरे कपड़े.करीने से संवारे बाल.
''कौन कौन रहता है इस घर में? '' - मैंने उस से पूछा
फी-फी करके हंसती रही वो, कोई जवाब नही उसने.कई बार पूछा,  पर कोई जवाब नही.
साडी के पल्ले से आधे मुँह को ढके चुप्पी साधे हँसे जा रही थी.  मेरा धैर्य जैसे खोने ही वाला हो. गुस्सा सा आने लगा मुझे. ये  भी कोई तरीका हुआ. सजी धजी पूरी और तमीज नाम की चीज नही.
''जाओ अपनी बड़ी बहन को या जो भी सबसे बड़ी है उसे बुलाओ''-मैंने अपनी झल्लाहट पर काबू पाते हुए उसे कहा.एक कर सब बाहर आ गई .मुझे बताया कि वे पिछले पांच साल से यहीं रहती है और फेक्ट्री में मजदूरी करती है. एक दूसरी को अपनी सगी बहिने बताने वालियों ने माता पिता और घर ,गाँव के पते अलग अलग बताए.
इतने में पीछे से किसी की आवाज आई -'गुड इवनिंग मेडम!'

  मैं मुडी  जरूर कोई परिचित ही होगा मैंने अभिवादन का जवाब दिया.

''आप यहाँ? जाइए. यहाँ से...........''

मैंने लड़कियों की ओर देखा और -पूछा -'' नयागांव से आई हो? बांछ्डी जात से हो?  कोई बात नही, बेटा तुम अंदर जाओ.मुझे पहले ही बता देती तो तुम्हारा,मेरा दोनों का समय खराब नही होता.....पर कोई बात नही''
वे सब 'वेश्याएं' थी..मूल निवासी नयागांव ,मध्य प्रदेश.  महीने में पांच,दस- पन्द्रह दिन के लिए आती है फिर चली जाती हैं.