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Monday, 5 December 2011

और तारा चमक उठा-दिनेश


क्या लिखूं? बस इच्छा हो रही है कुछ लिखूं? कुछ शेअर करूं. मन की बात करूं.
अभी सोच ही रही थी कि कहाँ से शुरू करूं ? तभी मोबाईल में कोयल कुहुक उठी.
संडे  है शायद किसी ने फोन करने का मानस बना ही लिया है.
याद आ ही गई हो किसी को अपनी भी.
हा हा हा
मोबाईल उठाया,एक मुस्कराहट चेहरे पर फ़ैल गई नाम पढते ही.
जिसका फोन आया था उसके फोन पर अक्सर में मुस्करा देती हूँ.
किसका था ? बताऊं ? पर देखिये इसे आप लोग अन्यथा नही लेंगे .
मैं अनकम्फर्ट फील कर रही हूँ उसके बारे में बताते हुए.
अरे! ऐसा कुछ नही जिया जिसके बारे में उनसे छिपाना पड़े जिन्हें मैं
प्यार करती हूँ,अपने पति,बच्चों या फेमिलिअर्स से.
फिर? प्लीज़ मुझे माफ कर दीजियेगा और इसे मेरी आत्मश्लाघा न
समझियेगा,प्लीज़,प्लीज़,प्लीज़.
फोन  था दिनेश का. दिनेश ?
नही वो मेरा बेटा भी नही,भाई,दोस्त या मेरा एक्स-स्टूडेंट भी नही.
फिर????????
मैं सरकारी स्कूल में टीचर हूँ, जाने क्यों शुरू से लगता था कि प्राइमरी
स्कूल्स में अच्छे,सहनशील,बच्चों के मन को समझने वाले, माँ की तरह प्यार देने वाले  टीचर्स की ज्यादा जरूरत है  और ...........इस मामले में अपने आपको 'तोप' समझने वाली मैं फर्स्ट ग्रेड टीचर,कोलेज लेक्चररशिप सब छोड़छाड  के प्राइमरी स्कूल टीचर बन गई.
बात है १५-१६ पहले की.
समर ट्रेनिंग चल रही थी टीचर्स की.  मैं भी थी.
एक १८-१९ वर्ष का लड़का खेल खेल में बच्चों को कैसे पढाया जा सकता है,
हमें सिखा रहा था.
उसके पढाने,सिखाने का तरीका बहुत ही मनमोहक,रोचक था. सांवला सा,दुबला पतला,शर्ट घिसी हुई कई जगह से सिली हुई उसकी आर्थिक मजबूरियों को दर्शारही थी.

अपना लेसन देने के बाद वो हर बार आ कर मेरे पास ही बैठ जाता.

बातचीत चली. बोला - ''मेडम ! मैं बहुत गरीब परिवार से हूँ, पिताजी
मजदूरी करते हैं. माँ बकरियां चराती है. इसलिए मैंने दसवी पास करके पढाई छोड़ दी, एक साब ने देखा मुझे कठपुतली से बच्चों को कुछ सिखाते हुए तो मुझे ले आये ''

''इन सब बातों  के लिए तुम्हे शर्मिंदा नही होना चाहिए,तुम्हे गर्व होना
चाहिए कि खुद अनपढ़ होते हुए भी उन्होंने तुम्हे टेंथ तक पढाया.''  मैंने
अपनी बात जारी रखते हुए उसे समझाया कि तुम चाहो तो तुम्हारे पूरे परिवारका भविष्य बदल सकते हो.' 

'कैसे?'

'वापस पढाई शुरू करो. तुम कर सकते हो, इंटेलिजेंट हो. पढलिख कर काबिल बन जाओगे तो परिवार के लिए कुछ कर पाओगे.एक बार हिम्मत करो.मेरी मदद चाहिए तो जो मुझसे बन पडेगी मैं करूंगी. तुम कुछ बन गए तो मुझे मन में शांति मिलेगी और मेरा तुमसे मिलना सार्थक हो जायेगा.' - मैंने अपनी बात जारी रखते हुए फिर कहा-'' देखो! क्यों इतने टीचर्स को छोड़ कर तुम रोज मेरे ही पास आ कर बैठते हो क्या ये ईश्वर की कोई इच्छा नही है ? शायद वो चाहता है कि तुम कुछ बनो. और 'वो' ये भी जानता है कि मैं इन सब कामों को करने में सुकून पाती हूँ. एक बार अपने टेलेंट को पहचानो.तुम मामूली बच्चे नही हो. तुम्हारी फीस,बुक्स जो भी तुम्हे जरूरत हो, मैं.......''

'नही,मेडम ! इतना तो मैं कमा लेता हूँ .....'

ट्रेनिंग खत्म हो गई और वो चला गया.
..................................................

कई सालों बाद .......
बड़े भाई साहब ने -जिन्हें मैं बचपन से 'सियाबी' कहती हूँ - मुझे बुला कर
बोला -'आज एक फोन आया था.कोई दिनेश वैष्णव नाम का आदमी तुझ से मिलना चाहता  है, मैंने उसे कह दिया 'आ जाओ'.

मैं भूल चुकी थी बिलकुल कि कोई दिनेश है जिसे मैं जानती हूँ या वो मुझे
जानता भी होगा.
रात लगभग आठ नौ बजे सियाबी के घर पर एक युवक आया. काली पैंट,सफेद शर्ट चमचमाते जूते हाथ में बेग स्मार्ट सा दिख रहा था.

आते ही उसने भैया,भाभी और मेरे पैर छुए.

'दीदी! आपने मुझे पहचाना नही ? मैं दिनश वैष्णव  ....ट्रेनिग में मिले थे.'- उसने याद दिलाते हुए बोला.

'आपने मेरी डायरी में कुछ लिखा था ...कि मैं बहुत कुछ कर सकता हूँ.मुझमे एक 'स्पार्क' है और.......याद कीजिये ना. मैं कल ही चित्तोड ट्रेनिंग के लिए आया था.जिस होटल में रुका था.उनसे ज़िक्र किया, आपकी फेमिली का ज़िक्र किया. उस होटलवाले ने बताया. यहाँ तीन गोस्वामी फोरेस्ट डिपार्टमेंट में है. एक फोरेस्ट ऑफिसर हैं.जिनकी बहिन टीचर है और उनके पति विदेश में नौकरी करते हैं. आप शायद उन्ही के बारे में जानना चाहते हैं उनका घर मुझे मालूम है. उनकी बहिन इंदु दीदी कहाँ रहती है ये मुझे नही मालूम.बस मैंने टेलीफोन ड़ायरेक्टरी में से भैया का नम्बर ढूँढा और आप तक पहुँच गया दीदी !.' -दिनेश ने सारा ब्यौरा सामने रख दिया.

मुझे याद आ गया-'अरे! तुम तो एकदम बदल गए. क्या कर रहे हो आज कल? नौकरी करते हो?'

'हाँ दीदी! मैं जिला शिक्षा अधिकारी हूँ.आपसे मिलने के बाद मैंने
बी.ए.किया. फिर एम.ए. बी.एड करके टीचर बन गया. एम.एड करने के बाद कम्पीटिशन दिया स्कूल-लेक्चरर बना .पांच साल बाद फिर जिला शिक्षा अधिकारी बन गया.मैंने कोटा में घर बनवा लिया है.गाँव में भी जमीन खरीदी. घर पक्का बनवाया.बहिन की शादी की उसे भी बी.ए.बी.एड. करवा दिया था. भाई इंजिनीयरिंग कर रहा है.बच्चे कोन्वेंट में पढ़ रहे हैं.' -दिनेश ने बताया.

'मेरे घर में सब आपको जानते हैं.आपका फोन नम्बर दीजिए.मेरी बेटी और 'आपकी बहु' आपसे बात करना चाहते हैं.मिलना चाहते हैं.दीदी! आप ना मिलती तो
......'
दिनेश बेहद भावुक किस्म का 'लड़का' है.बार बार उसकी आँखों में  आँसू
छलछला  आ रहे थे.

. 'जानती हो आपने जो मेरी डायरी में लिखा था उस पेज को मैंने तस्वीर में 'फ्रेम' करवा के अपने 'ड्राईग रूम' में लगा रखी है.'
..................................

आज भी उसकी पत्नी और दोनों बच्चों से फोन पर बात होती रहती है.

'बुआ! आप हमारे यहाँ कब आएँगी?'

'आउंगी बेटा ! किसी दिन, तुम आ जाओ ' मैं हर बार यही जवाब देती हूँ .

........................................ मगर मुझे खुशी है मैंने 'कुछ'
तो अच्छा किया दिनेश ने बहुत मेहनत की .पर मैंने अपने बोलने की इस आदत का 'सद्उपयोग' किया.
आप भी करिये न . आपके मोटिवेशन से शायद एक परिवार और कई जीवन नया और खूबसूरत जीवन पा जाये.

सच कह रही हूँ ना?