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Friday, 14 October 2011

तुम ही बताओ, कौन हो ?





पहले नही सोचती थी
आजकल बहुत सोचती हूँ
जीवन की आपा धापी में साल दर साल बीतते गये 
पता ही नही चला कब यहाँ तक आ गये हम
डरने लगी हूँ ,
अब जब मुझे तुम्हारी और तुम्हे मेरी जरूरत है ,
हम कहीं ..कभी ...........??
राखी आज भी भाई के हाथों में बांधती  हूँ 
पर हर दुःख ,परेशानी तकलीफ के क्षणों में तुम साथ थे 
हर आफत ,बुरी नजर से बचाया, वो तुम थे 
पर भाई नही हो 
जब भी शरीर या मन दुखी हुआ तुमही ने गले लगा कर 
हिम्मत दिलाई 
रातों को जाग कर सेवा भी की 
जब तुम माथे पर हाथ फेर कर पीठ थपथपाते हो 
छोटी सी बच्ची बन जाती हूँ 
एक एक बात बतलाती हूँ 
तुम समझाते हो क्या सही ,क्या गलत है ?
पर पिता भी नही हो 
सात फेरे लेके तुम्हारे पीछे पीछे चली आई 
शादी,ससुराल,पति,परिवार,जिम्मेदारियां 
सबका अर्थ तुमही ने समझाया,रिश्तो को निभाना भी
तुम टीचर या गुरु भी नही  
फिर क्या हो ? एक रिश्ता जो शरीर से शुरू हुआ
और आत्मा का हिस्सा बन गया
कब दो से हम एक हो गये
आज जब सब कुछ 'सेट' हो गया
जीवन में जो सपने देखे थे वो एक के कर पूरे हो गये
क्यों डरती हूँ ?
घर में घुसते ही तुम्हारा ये कहना
'तुम्हारी मम्मी कहाँ है ?'
मुझे कंपा देता है
जाने कब हम .........?
तुम्हे अकेला छोड़ कर नही जाना चाहती
और..............................
तुम्हारे बाद भी नही .........
तुम्हारे बिना भी नही