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Wednesday, 12 June 2013

फिर वो क्या करती ???



उसका मुंह तमतमा रहा था। सांवला रंग ताम्बई हो गया था। बिना किसी भूमिका के उसने कहा -'' आप से एक काम है। बहुत जरूरी काम।ये सब लिखना विखना बंद करो और मेरे साथ चलो।अभी इसी समय चलो बस कह दिया आपको ''

'' अरे! पर हुआ क्या चंदा ?? कुछ बताएगी भी....'' मैने पूछा।

 पडोस में रहने वाली यह युवती  दो तीन साल से ही ससुराल आने जाने लगी थी। तीखे नैन नक्श सांवला रंग बीस बाईस साल की आयु। पर तेज तर्रार तो लगती ही थी। न किसी के घर जाना न किसी को अपने घर बुलाना।रास्ते आते जाते कोई मिला कुछ पूछा तो जवाब दे दिया वरना अपने हाल में मस्त।  मुझ से बातें करती थी कभी कभी। उसका यूँ अचानक आते ही जिद पर अड़ना और अधिकारपूर्वक बोलना मुझे अच्छा ही लगा .  आज इस को मेरी जरूरत क्यों पड़ गई??? रास्ते भर मैं यही सोचती रही।

उसके घर पहुंची तो अपने श्रीमान जी को बैठे देखा। उसके ससुर,पति गाँव के कुछ प्रतिष्ठित लोग भी बैठे हुए आपस में बतिया रहे थे।
किस लिए उन सबको बुलाया गया था कोई नही जानता था।
थोड़ी देर में पडोस की है एक और युवती आकर खड़ी हो गई। उसके पीछे पीछे पड़ोस का एक  और आदमी महेन्द्र कमरे के भीतर घुसा। हम एक दुसरे का मुंह ही देख रहे थे. 

चेहरे पर छोटा सा घूँघट डाले चंदा ने पास खड़ी लडकी से बोला - ' 'हाँ अब सबके सामने बताओ कि इन्होने आपको क्या कहा?'

लड़की एक बार घबराई -''छोड़ो न भाभी! अब कभी भी वो कुछ नही कहेंगे आपको ''

चन्दा एकदम शांत थी। तुफान से पहले की शांति की तरह शांत। 

' तुमने मुझे कहा। बहुत बड़ी बात है यह या तो तुम आज के बाद झूठ बोलना भूल जाओगी या 'ये' ......' अपने पड़ोसी महेन्द्र की और देखते हुए वो बोली।

'' आप लोग मेरे पिता के समान हैं . नही पिता हैं। अपनी बात आप से न कहूँ तो किसको कहूँ ??? अपराधी हूँ तो दंड दीजिये। नही तो ........' चंदा ने बात जारी रखी। ' हाँ बोलो जीजी ! इन्होने क्या कहा आपको??'

महेन्द्र के चेहरे का रंग उड़ गया। 

' बा! महेंद्रियो म्हने बोल्यो कि चंदा ने कीजे कि पांच हजार रूपये दूँगा एक रात के लिये……. '

हम सब सन्न रह गये। 

'झूठ बोल रही है ये सुगना' महेंद्र ने विरोध किया। 

 'म्हारा सामने बोल. मैं झूठ बोल रही हूँ ??? रख तेरे छोरे के माथे पर हाथ। मेरे बाप को मालूम पड़  गया तो वो मुझे गाड़  देगा जिन्दा ही कि मैंने थारी ऐसी बात सुनी ही क्यों?? झूठा ! झूठ बोल रहा है मेरे ही सामने।थारी (तेरी) बाई और लुगाई यहीं हैं पास के कमरे में और तेरा छोरा भी। सब सुन रहे हैं वो भी' - सुगना गुस्से से चिल्लाई।

महेंद्र के घबराए पीले पड़े चेहरे पर पसीने की बूंदे तैरने लगी थी।

तभी तकिये के नीचे से कुछ कागज निकालकर चन्दा ने महेन्द्र की हथेली पर रख दिए।

'ये मेरे खेत और मेरे घर के कागजात हैं। तू रख। मैं तेरे जैसी पैसे वाली नही हूँ . जो है ये है हमारे पास। पर जो असल बामन की बेटी हूँ तो तुझ से दुबारा मांगु . बस  एक बार तेरी लुगाई को 'इनके' पास भेज दे।तू पांच हजार में मुझे खरीद सकता है न ?? मैं और मेरे परिवार वाले हंसते हंसते ये सब तेरे नाम कर  देंगे।  तू भेज ' चंदा चण्डी के रूप में थी पर ...... न चीखी न चिल्लाई न कोई हंगामा किया। आवाज़ में दृढ़ता थी। एक तेज उसके चेहरे से फूट रहा था।

महेन्द्र हाथ जोड़े खड़ा कांप रहा था। उसे उम्मीद नही थी कि  बात इतनी बढ़ जाएगी। उसकी माँ की बुज़ुर्ग आँखे सब पढ़ चुकी थी।

'' माफ़ कर दो इसे। मेरी बेटी है तू ! मेरे बुढ़ापे को देख. इन बालों की सफेदी में पड़े धूल को लेकर किसे मुंह दिखाऊँगी?? देख मेरी बिन्दनी (बहु) भी थारे पैर पकड़ लिए हैं। ''

चंदा ने हम सभी के सामने हाथ जोड़े कुछ देर खड़ी रही। फिर बिना कुछ बोले कमरे के भीतर चली गई। उसकी आँखों में आंसू थरथरा रहे थे।जाने क्यों ???? आपको मालूम ????







7 comments:

  1. Ma Sa,
    The unfortunate reality is that 'Men' still consider 'Women' essentially as properties which carries a price and can be used for gratification of their sexual need. However, the same hypocrites are unable to digest a similar connotation for females of their fold!
    I consider Chanda's reaction as a just expression of rage against this mentality, welcome and brave attempt particularly in a Male-dominated society that Rajasthan is!
    Kudos to Woman Power!
    D

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    1. Dil ko chu leti hain apki kahaaniya.. Di <3

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    2. This has been a reality ever since the evolution and civilizational growth. Power of any and every kind has been mostly misused and abused but rarely used to help 'Self and Others' in a positive sense. Neither males nor Females are exceptions in this matter.

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  2. मैं ने सोचा यहाँ कोई कहानी लिखी होगी! अरे ये तो हमारे आसपास की सच्चाई है, वो भी निर्वस्त्र!
    मानवीय (पुरुष विशेष) दुर्बलता का सही चित्रण कर दिया आपने।

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  3. Wakya aaz ki ek dardanak sachchai hai, chinta ka vishay hai aapne ise bade hi kam shabdon mei sunderta se vyakt kia hai . Jab tak samaj ko soch nahi badlega tab tak na jane kitni Chanda iska shikar banegi . Bharat mei samaj ka mool roop se badlav zaroori hai .

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  4. वाह . बहुत उम्दा,सुन्दर व् सार्थक प्रस्तुति
    कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
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