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Wednesday, 24 August 2011

दोराहा

अन्ना लहर .....भ्रष्टाचार के विरोध में उठती आवाजे ........ सोचते सोचते जाने कहाँ भटक आई बीते कल की गलियों में. नही कहूँगी मन शांत है.....विचलित हूँ. इस भ्रष्टाचार को घटाने ...बढाने में मेरा...एक इंसान...एक पत्नी...एक माँ के रूप में क्या रोल रहा अब तक ?
                                   १

चौबीस अप्रेल उन्नीस सौ अठत्तर. डॉक्टर ने बताया बच्चा सिजेरियन ही होगा.'
'कर दीजिए डॉक्टर साहब ! मेरी बेटी मर जायेगी.बच्चा मर जाएगा'- मम्मी फूट फूट कर रो रही थी.
लेडी डॉक्टर ने 'इन्हें' बुलाया.(पीहर के परिवार के नाम से शहर में एक खौफ था) और रुपयों की डिमांड रखी ऑपरेशन से पहले.
''वो मर भी जायेगी तो भी मैं आपको रूपये दे के ही जाऊँगा आप ऑपरेशन तो शुरू कीजिये''- गोस्वामीजी ने डॉक्टर से कहा.................... और चुपके से डॉक्टर को एक हजार रूपये दिए पूरे स्टाफ के लिए.

'' मेरे लिए तुम्हारा और बच्चे का जीवन ज्यादा कीमती था......एनेस्थेसिया ज्यादा दे देते तो?????ऑपरेशन में कोई लापरवाही.....????? ऐसे समय में आदर्श...सिद्धांतों की बातें????? पगली!''-इन्होने मेरे माथे पर हाथ फेरते हुए बाद में बताया था.
                                         २

भीलवाडा शहर के नामी व्यक्ति थे दा'साहब-मेरे ससुर. धनी भी. हा हा हा किन्तु........दो बेटों ने एक साथ व्यापार में जबर्दस्त घाटा खाया.उनमें से एक गोस्वामीजी थे.
अपने हिस्से का सबकुछ बेचने के बाद भी घाटा???अब भी कर्ज बाकि था.
घर रहा नही.शहर भी छूट गया. दा'साहब चित्तोड सर्वोदय संस्था के करता धर्ता थे.वे दोनों भाइयों को सपरिवार यहाँ ले आये.

एक दिन एक ऑटो घर के बाहर आ कर रुका.
''दीदी! बड़े भैया ने 'ये' भेजा है''-ऑटो वाले ने कहा.
मैंने देखा उसमे दो-तीन बोरी गेहूं,तेल के दो पीपे और भी काफी सामान था.
''मदन! तुम इसे वापस ले जाओ.''-मैंने उससे कहा.
अकाल  राहत काम में मजदूरों को नकद भुगतान के स्थान पर दिए जाने वाला सामान था.
भाई भी नाराज और 'ये' भी.
'' कोई कितने दिन मदद करेगा? हम दोनों नौकरी करेंगे.कर्ज भी चुकायेंगे....सब करेंगे. आप केसर पुरीजी के बेटे हैं जिनकी इमानदारी की लोग कसमे खाते हैं....''

भूख से तडपते व्यक्ति का कोई धर्म नही होता............भूखे हैं सामने थाली है...उसे ठुकरा देना बहुत मुश्किल होता है .सारे आदर्शो सिद्धांतों की चूले हिल जाती है.

                                  ३
 गोस्वामीजी को सऊदी अरब की एक सीमेंट फेक्टरी में अच्छी पोस्ट और अच्छा जॉब मिल गया.
मैं ............और मेरे बच्चे...मेरी नौकरी और मेरा अकेलापन.  जिस व्यक्ति के बिना एक सप्ताह भी शादी के बाद कभी नही निकाला उसके बिना पूरा साल निकालना था.

अपने आपको खाली बचे समय में भी व्यस्त रखने के लिए 'कुछ' छोटे मोटे काम करने शुरू किये.............विधवाओं,विकलांगों की पेंशन करवाना,गरीब किन्तु पढ़ने में होशियार बच्चो की फीस,किताबे,युनिफोर्म्स की व्यवस्था करना,इसके लिए लोगो को मोटिवेट करना....गाँवों के विकास के लिए समथिंग...समथिंग हा हा हा

और........जाने कहाँ कहाँ से विकलांग लोग बैसाखियों के सहारे,घसीटते हुए घर तक आने लगे.
''मेडम जी ! इतने साल हो गए भटकते हुए...'उसे' इतना दिया.अब तक कुछ नही हुआ.आप करवा दीजिए.ये रूपये लीजिए.' ये लोग मुझे जबरन रूपये देना चाहते थे.मैंने कभी नही लिए.
एक दिन मन डोल गया.
''कितने लोग आते हैं दिन भर! मैं इनका काम करवाने के लिए ऑफिसों में जाती हूँ. काम जल्दी हो जाए इसीलिए जाते ही उनके पूरे स्टाफ को चाय पिलाती हूँ.जूस पिलाती हूँ.पेट्रोल अपनी जेब का खर्च करती हूँ. ये लोग दूसरों को भी तो रूपये देते ही हैं? मैं क्यों नही ले सकती? इन पैसो के लिए ही तो आज तुम्हारे पापा हमसे दूर हैं ''-मैंने अपने दोनों बेटो से पूछते हुए बोला.

''आप ये काम क्यों करती हो मम्मी? समय बिताने के लिए ? अपने मन के सुकून के लिए न??  समय तो बीत जायेगा अच्छी तरह किन्तु पैसा लेना शुरू कर दोगी न मम्मी! तो मन को फिर ऐसा सुकून कभी नही मिलेगा फिर तो ये सब आपका साइड जॉब हो जाएगा''- छोटे बेटे आदित्य ने जवाब दिया. मैंने पकड़ कर उसे गले लगा लिया.

                                           ४
 बड़े बेटे का एम्.बी.ए. के लिए सिम्बोएसिस में एडमिशन निश्चित था. इतनी फीस ! आगे इतना खर्च! हम दोनों  सोच रहे थे.
एक दिन..............
''कुछ बिल है उन्हें पास करने के लिए ठेकेदार ने मुझे ऑफर दी है.अब कोई परेशानी नही.ऋतू भी अच्छे कोलेज से प्रोफेशनल कोर्स कर लेगा और टीटू भी''-इन्होने कहा.

''आप कौन हो जानते हो? किसके बेटे हो जानते हो? ईश्वर अच्छे लोगो का इम्तिहान लेता है.आप और मैं-हम अच्छे इंसान है जानाजी..........''-मैंने समझान चाहा.
''तुम्हारे आदर्शों और सिद्धांतों की बहुत कीमते चुकाई है मैंने''- गुस्से में ये चिल्लाये.
''इस जनम में निभा लो जानाजी.अगले जनम में मुझ जैसी बीवी आपको भगवान कभी न दे.....लोन ले लेंगे न.घबराते क्यूँ हैं?''  पत्नी होने के नाते मेरा धर्म था अपने पति गलत काम करने से रोकूँ. मैंने किया.
''भैया! (बडो से शर्म के कारन कभी बेटा नही कह पाई.छोटी हूँ न पीहर ससुराल में...मैं गंवार औरत) थोड़े सस्ते कोलेज में एडमिशन ले लो बेटा.घर बनवाना है.ऋतू को भी हायर एजुकेशन के लिए भेजना पडेगा न? फिर....अप्पू भी है.समझ रहे हो न? इसके कारन शुरू मे जोब ढंग का नही मिलेगा.किन्तु अपनी मेहनत से तुम खुद को प्रूव करोगे तो......तुम्हे आगे बढने से कोई नही रोक सकता.''मैंने बड़े बेटे को समझाते हुए कहा.
'' यार ममुडी तु बड़ी सेंटी है.इतना गिल्टी फील करने की जरूरत नही.एक बार पापा ने गलत काम शुरू किया तो......दलदल है ये '' -बड़ा बेटा टीटू मुझे गले लगा कर मेरी पीठ थपथपा रहा था.
मैंने करीब से देखा. महसूस किया.  कैसे परिस्थियाँ भ्रष्ट बनने को प्रेरित करती है और कितना मुश्किल होता है........एक सही फैसला लेना.

आप क्या सोचते हैं नही जानती किन्तु.....आज मेरे दोनों बच्चे ऑफिसर है और........एक अच्छे इंसान भी.
भ्रष्ट एक व्यक्ति या एक अधिकारी होता है ?  या......उसके अपने भी उतने ही जिम्मेदार होते है?आप  ही बताइये.

 बहुत कठीन है ये इमानदारी और सिद्धांतों के साथ जीने का रास्ता
....मगर एक नूर समा जाता है चेहरे और आत्मा में. मौत को करीब देख कर भी कोई भय...कोई  अफ़सोस..कोई बोझ आत्मा पर नही रहता. हाल ही यह भी अनुभव इश्वर ने दे दिया.हा हा हा
                           इसी तरह अपनी पनाह में रखना ईश्वर! तुझसे नजर मिला सकूं बस!