Pages

Friday, 19 August 2011

आरती

मैं कोई बहुत अक्लमंद या विदुषी महिला नही
ना ही किसी भी एंगल से ऐसी कि कोई रुक कर देखना चाहे .
एकदम 'ऑर्डिनरी' आम भारतीय चेहरा,साधारण सा व्यक्तित्व.
भगवान की दया से दिमाग भी नही है ,जो है दिल है .
दिल को छू जाने वाले वाकयों से जीवन को जीना सीखा है मैंने 
और पाया, दिल ने हर बार सही रास्ता दिखाया .
नफा,नुक्सान क्या मिला? इसकी भी ज्यादा परवाह नही की.
दिमाग सबके, दिल मेरा और मिला के जीवन के फैसले ले लिए.
और... रिजल्ट ज्यादातर बहूत खूबसूरत मिले , कहते हैं इस दिल में इश्वर रहता है.कौन जाने ?
 पर  यदि रहता है तो वो अपने बच्चों को गलत रास्ता दिखायेगा क्या?
मैं उसी से पूछती हूँ -''ए !बोलना ये करूँ या ना करूँ ?''
जाने अंदर से कौन बोलता है ईश्वर,अंतरात्मा या हमारा अचेतन मन? पर बोलता सच है. 

खूबसूरत वाकयों ने जीना सीखाया. .  ऐसा ही एक वाकया है जिसने मन को छुआ.और.........प्यार के अर्थ,उसकी गहराई से परिचय कराया.
बताऊँ ?
मैंने 'उन्हें' नही देखा ,जानती भी नही उन्हें.बस सुना और इतना .....कि यकीन नही होता .
क्या ऐसे लोग आज भी इस धरती पर रहते हैं ?
क्या आज भी प्यार,दोस्ती ,रिश्तों या 'अपनों' के नाम पर कोई हंसते हंसते अपने जीवन को यूँ ..............?
एक 'गाँव' में दोनों रहते थे .उम्र का आकर्षण ,लगाव,प्यार, दोस्ती कुछ भी कह लीजिये था दोनों के बीच .
वो 'जीनियस' संस्कारी, सिद्दांतों वाला.  तो लडकी खूबसूरत, भावुक, गरीब की बेटी और उच्च चरित्र ' स्ट्रोंग-करेक्टर' की.
सपना था पढ़ लिख कर काबिल बनेंगे अम्मा बाबूजी की आज्ञा से ब्याह कर लेंगे .जीवन भर साथ रहेंगे .सजातीय भी थे .गांवों में 'ये' सब होना आज भी मायने रखता है ,३४-३५ साल पहले तो...........
मगर लडके के बाबूजी तैयार नही थे .शायद बेटे को 'केश' करना ही उनका उद्देश्य,मजबूरी,कारण रहा होगा .
पढ़ा लिखा कर उस जमाने में इंजीनिअर  बनाया था, बेटा भी ऐसा  श्रवण कुमार ,'राम' लक्ष्मण और भरत को मिला कर एक  ही मानव रूप दे दिया हो ईश्वर ने . समझाया , अपनी ओर से बहूत समझाया अपने बाबूजी को . पर वे टस से मस नही हुए .
'''प्यार मोहोब्बत की बातें करते हो हमारे सामने , बेशर्म , जवानी के जोश हैं ये. उम्र के साथ खत्म हो जाते है ,इतनी सच्ची चाहने वाली है वो तो कहो उसे हमारे बड़के भैया  के बेटे से ब्याह करे ,  करोडपति हैं भैया. वो भूखे नंगे घर की है , निहाल हो जाएगी ''
'' बाबूजी! आप जानते हैं नम्बर वन आवारा,ऐय्याश ,शराबी,कबाबी लड़का है वो , उससे........? हम खुद नही होने देंगे ऐसे आदमी से उसका ब्याह ,  ना करिये हम से,   कोई बात नही, आपकी बात नही टालेंगे,  पर.....  ''
''तुम और तुम्हारी ये नाटकबाजी.बड़ा सच्चा,बड़ा पवित्र प्यार है ?  हमी को सिखा रहे हो. बहुत दुनिया देखी है हमने और किताबो ,  फिल्मो में खूब पढ़े, देखे हैं ये ड्रामे भी. एक बार उस लडकी को कह कर देखो जान तक दे देने को तैयार रहने वाली तुम्हारी 'वो' प्रेमिका .......असलियत आ जाएगी सामने ''   बाबूजी ने अपना सारा आक्रोश जहरीले शब्दों के साथ उगल दिया बेटे के सामने.
कई दिन, कई सप्ताह बीत गये 'उसे'  सोचते सोचते .एक दिन उठ खड़े हुए और जा पहुंचे अपनी 'आरती' के सामने .
'' आरती ! हम एक बात कहें मानोगी ? ''
'' मानोगी? हमसे पूछ रहे हो? कह दो क्या करना है ? हम आपके  आदेश सुनते है, मानते हैं, इतना ही जानते है बस ''
''बड़के भैया है ना हमारे 'सूरजदीन' उनसे बियाह कर लो.   हाँ सब जानते हैं, तुम भी जानती हो ,रईस बाप की बिगड़ी औलाद हैं पर ..... उनको कोई लडकी देगा भी नही ,  सब ठौर बदनाम हैं, क्या कहें तुमसे........... ? ''
''हमारे कारण आपको बाबूजी का इत्ता बात सुनना पड़ा,  हम नही जानते पिरेम महोब्बत क्या होता है?  हमारे लिए इसका मतलब है 'आपकी आँखों में आंसू नही'   बस ..... '' वो दृढ़ता से बोली.
''हम तुम्हे मजबूर नही कर रहे आरती ,तुम्हारी जिंदगी है,फैसला तुम्हे करना है कल पछताओ ना '' लडके ने समझाया . कहीं 'गिल्टी' महसूस हो रही थी .आत्मा पर एक बोझ सा बढ़ गया था,  आवाज कंपकपा  रही थी.
............................................................
................................................................
''हमारे गौड़ ना पड़िये आप.( पाँव मत छुईये ) ''-    आरती ने टोंकते हुए कहा .
''अब आप हमारी बड़ी भौजी हैं, ये हमारा अधिकार है,आशीर्वाद देना आपका कर्त्तव्य . आप 'साधारण' औरत नही हैं, हमारे मन में आपका दर्जा.......''  'वो' नही चाहते थे कि उनको रोता- सा भी आरती महसूस करे.
''आप खुस हैं ? '' उनका 'श' को 'स' बोलना आज भी जारी है,  आरती को अच्छा लगता था जब वो उनका 'श' को 'स' बोलना सुनती थी  .
'' वो नपुंसक हैं ,लल्लाजी ''  तटस्थ भाव से वो बोली .
'उन्होंने' आरती के जीवन पर बिजली ही गिराई थी,   सहज भाव से उसने झेल ली थी.
अब बारी 'इनकी'  थी. पुरुष है ना,   हिल गये समूचे .
''हम ईलाज करवाएंगे भैया का. अच्छे से अच्छा डाक्टर ढूंढेंगे, आप सुखी जीवन जियेंगी और ढेरों बच्चों की माँ भी बनेंगी, भौजी ! ''
''लल्ला ! अगले जनम में हम से कोई वचन न लेना . हम भौजी नही बनेंगी तुम्हारी. माँ का मान देते हो हमें ,मुक्त कर दो इससे हमें बबुआ . अगले जनम में हम आरती बनेंगे सिर्फ तुम्हारी 'आरती' और किसी की बात नही मानेंगे. ना तुम्हारे बाबूजी की, ना अपने बाबूजी की, ना तुम्हारी, चले जाओ यहाँ से ,  हम इनके प्रति 'पियार' कहाँ से उपजायेंगे  अपने मन में ? कभी दिखोगे तो दूर से देख लिया करेंगे 'तुम्हे' ,नही तो...........इन्तजार करेंगे तुम्हारा अगले जनम में .........''  आरती भौजी की आवाज में कोई भावुकता नही थी. दृढ शब्द थे बस .
'' मगर तीन साल तक हमने उनका साथ नही छोड़ा,उनके सामने उस दिन के बाद कभी नही गये .किन्तु भैया का इलाज करवाया , दो बच्चे  हो गये उनके. आज सुखी है, नौकरी भी लगवा दी भाभी की. आज बत्तीस साल हो गये शक्ल भी नही देखी उनकी , अम्मा कहती है, सूरजदीन  तो बुढाए  गया है पर आरती तो जैसे उम्र को तुम्हारी यादों की तरह अपने से चिपकाये बैठी है. कौन जाने ? पर.....हम जीते जी उनके सामने नही जायेंगे कभी भी,  मूनजी! '' उन्होंने मुझ से कहा .
क्या कहेंगे इसे पढ़ कर ?
''मैं अपना माथा आपके और 'आरती भौजी' के पैरों पर रख कर रोना चाहती हूँ , खूब रोना चाहती हूँ .....''  मैं कहना चाहती थी ,पर ............. 





ठाकुर पद्म सिंह श्रीनेत ने अपने ब्लॉग 'पद्मावाली' में लिखा 'आरती भौजी' के लिए -


पद्मावलि


कुछ दिन पहले इंदु पुरी जी के ब्लॉग पर  एक कहानी पढ़  रहा था आरती
पढ़ा …. एक बार, दो बार, बार बार पढ़ा
कई दिन ऊहापोह में बीत गए , मन में बहुत कुछ चलता रहा……
इतना कुछ …. कि कुछ नहीं लिख पाया दो चार दिन
कहानी बहुत अच्छी है … आरती और एक लड़के की कहानी … बड़ी संवेदनशील… मार्मिक
गाँव में रहते हैं दोनों … जीनियस , संस्कारी सिद्धांतों वाला लड़का है …..
लड़की आरती खूबसूरत है , भावुक है ..गरीब की बेटी है … और स्ट्रोंग करेक्टर
प्यार था … सपने थे दोनों के … साझे सपने थे
बड़े हो कर काबिल बनेंगे… अम्मा बाबू की आज्ञा से शादी करेंगे
सजातीय थे दोनों ….. हो सकती थी शादी
पर … लड़के के पिता नहीं चाहते थे ऐसा होना
कैश करना चाहते थे लड़के को …
बाबू जी ने शर्त रख दी एक ….. या कहिये परीक्षा ली प्यार की
और कहा कि इतना ही प्यार है उसे तुम से …
तो उस से कहो कि तुम्हारे बड़के भईया से शादी करे …
ऐयाश , आवारा  शराबी,कबाबी लड़का …बड़के भईया
और कई दिन लड़के के सोचविचार के बाद वही होता है … जो सदियों से होता आया है
लड़का कहता है लड़की से

आरती ! हम एक बात कहें मानोगी?”
मानोगी? हमसे पूछ रहे हो? कह दो क्या करना है ? हम आपके के आदेस सुनते है,मानते हैं ,इतना ही जानते है बस
बड़के भैया है ना हमारे सूरजदीनउनसे बियाह कर लो,हाँ सब जानते हैं तुम भी
जानती हो रईस बाप की बिगड़ी औलाद हैं पर ….. उनको कोई लडकी देगा भी नही ,सब ठौर बदनाम हैं, क्या कहें तुमसे……….. ? ”

और फिर …. परीक्षा ली गयी ….. परीक्षा दी गयी
और बड़के भईया से शादी हो गयी उस की …
भाभी बना कर पूजता रहा … पूरी जिंदगी …
मेरा दिल ये पूछता है … क्या साबित करना चाहती है कहानी
इतिहास का छद्म रूप धर कर महान बनाना चाहती है कहानी …….. मगर किसको …….?
इतना निष्ठुर इम्तहान लेने वाले को … ?
क्या अपराध था उस लड़की का … कि प्यार किया उस ने .. भरोसा किया लड़के पर … और अंधी श्रद्धा और अंधा विश्वास किया उस पर … इतना .. कि अपना अस्तित्व ही दांव पर लगा दिया और फिर से छली गयी…बेचीं गयी  फिर से उस विश्वास के बाजार में जहां स्त्रियों का इतिहास बिकता आया है …
प्रेम ही तो करती थी वो … उसके हाथ बिकी तो नहीं थी ?.
.. क्या अधिकार था उस पर लड़के का… अपनी बपौती समझ बैठा उसे …
और तब क्या होता… अगर उसके पिता कहते मेरे से ही शादी करवा दो उस की तब समझूँ तुम्हारे प्यार को .. तब??? ,…
सच्चा प्रेमी था ??…मगर किस का ……
लड़की का ?? या अपने पिता का …….
प्रेम की उस पुजारिन का …. जो एक इशारे पर प्राण देने को तत्पर है …..?
या धन लोलुप पिता का …..जिसने एक ऐयाश शराबी का हित सोचा और बेटे का प्रेम लूट लिया…
आखिर बेटा किस का … खाली पढ़ लेने से ‘जीनियस ‘ या चंद फलसफे सीख लेने से संस्कारवान हो जाता है कोई?
आखिर पिता को किस के प्रेम की परीक्षा दे रहा है ….
पिता के प्रति अपने प्रेम की ..? या आरती के प्रेम की …
और खुद बलिदानी बन बैठे … दे दी अपनी जागीर दान में ….. वाह !!
उस के दिल में ये प्रश्न क्यों न जगा … पिता से ही पूछता … आपका मेरे लिए प्यार सच्चा है तो कर दो मेरी शादी आरती से … विरोध किस बात का … भईया से ही क्यों … क्या पिता की नीयत पर जरा भी शक न हुआ उसे ??…
नहीं… शक होता क्यों … फिर कोई राम क्यों कहता… बलिदानी क्यों कहता कोई उसे … फिर तो स्वार्थी कहते सब … अहं को क्या जवाब देते … इस लिए चढा दिया बलिवेदी पर आरती को …
उसने सोचा भी कई दिन तक…. पर अंत तक अपने को बलिदानी बनने से ज्यादा कुछ नहीं सोच पाया …और ऐसा करते हुए आरती की सहमति या असहमति का ख़याल भी न आया मन में… हृदय कांपा नहीं निर्णय लेते हुए…. पुरुष युगों से नारी के हर त्याग को अपना अधिकार और उसके हर बलिदान को उसकी दुर्बलता मानता आया है। ये तो स्त्री की हतसंज्ञता के पार्श्व में उसका सदियों से चला आ रहा शोषण ही है।
और फिर क्या हुआ??? शादी हो गयी आरती की ….भईया के साथ … भौजी बन गयी वो
और प्रेमी जी पूजने भी  गए आरती को  …
अब आप हमारी बड़ी भौजी हैं, ये हमारा अधिकार है,आशीर्वाद देना आपका कर्त्तव्य . आप साधारणऔरत नही हैं, हमारे मन में आपका दर्जा…….”  ’वोनही चाहते थे कि उनको रोता- सा भी आरती महसूस करे.
आप खुस हैं ? ” उनका को बोलना आज भी जारी है ,आरती को अच्छा लगता था जब वो उनका को बोलना सुनती थी .
वो नपुंसक हैं ,लल्लाजी तटस्थ भाव से वो बोली .
उन्होंने आरती के जीवन पर बिजली ही गिराई थी, सहज भाव से उसने झेल ली थी .अब बारी ‘इनकी‘ थी. पुरुष है ना, हिल गये समूचे .

अब देखिये आरती भौजी की मनोदशा क्या है … शादी के बाद एक प्रश्न उठा होगा मन के कोने में …
प्रश्न उठना भी चाहिए ….. अगर उनके मन में नहीं उठा, तो मेरे मन में तो उठता ही है … आरती भौजी के भाग्य में नपुंसक ही लिखा था … शादी के पहले मानसिक रूप से … और शादी के बाद शारीरिक रूप से …
पर आरती को वही करना था जो उसने किया … और कोई चारा न था उसके पास … अपने प्रेम को साबित करने का… कोई आप्शन नहीं था … प्यार की परीक्षा देनी ही थी … ये बात अलग है कि उसकी दोनों तरफ हार थी …
लेखिका लिखें न लिखें…पर आरती के मन के कोने में कहीं न कहीं टीस ज़रूर उठी थी… उसे एहसास था कि कहीं कुछ गलत हो चुका है …पर तीर निकल चुका था … इस के अतिरिक्त और क्या कहती बेचारी —
लल्ला ! अगले जनम में हम से कोई वचन न लेना . हम भौजी नही बनेंगी तुम्हारी. माँ का मान देते हो हमें ,मुक्त कर दो इससे हमें बबुआ . अगले जनम में हम आरती बनेंगे सिर्फ तुम्हारी आरतीऔर किसी की बात नही मानेंगे. ना तुम्हारे बाबूजी की,ना अपने बाबूजी की,ना तुम्हारी, चले जाओ यहाँ से ,हम इनके प्रति पियारकहाँ से उपजायेंगे अपने मन में ? कभी दिखोगे तो दूर से देख लिया करेंगे तुम्हे‘ ,नही तो……इन्तजार करेंगे तुम्हारा अगले जनम में …….आरती भौजी की आवाज में कोई भावुकता नही थी. दृढ शब्द थे बस .
…नहीं.. आरती की आवाज़ में भावुकता नहीं थी ….पर दिल ..??? फट कर विदीर्ण न हो गया होगा..?
फिर से न छला होगा उसने अपने आप को ?? …..शायद लेखिका ने उसे अंदर जा कर बिस्तर पर टूट कर गिरते न देखा होगा …उसका सम्पूर्ण अस्तित्व भक् भक् कर जलते न देखा होगा …. हे विधाता … ये कैसी परीक्षा…
मुझे नहीं पता द्यूत में हारे जाने पर द्रौपदी, समाज की वेदी पर बलिदान होती सीता,  अथवा किसी के छल के अभिशाप को चुपचाप भोगती अहिल्या की मनोदशा क्या होती है .
किन्तु प्रश्न उठता है मन में …..यह…. कि क्या उनके मन में कोई प्रश्न नहीं उठा होगा ?
और अगर नहीं उठा  प्रश्न …
तो हज़ारों लाखों साल से प्रेम के नाम पर, त्याग के नाम पर छले जाने के लिए स्त्री खुद भी उतनी ही जिम्मेदार है जितना कि सामजिक व्यवस्था…
इस देश में नारी को देवत्व देकर उसे पूजा की वस्तु बना दिया गया। उसके मौन जड़ देवत्व में ही समाज अपना कल्याण समझने लगा। उसके चारों ओर संस्कारों का क्रूर पहरा बिठा दिया गया। उसकी निश्चेष्टता को भी उसके सहयोग और संतोष का सूचक माना गया।
और फिर आरती भी किस के साथ न्याय कर सकी होगी  ..
प्रेम के साथ..?
अपने साथ …?
पति के साथ..?
या फिर स्त्री मात्र के साथ ..?
रिश्तों के गूढ़ मर्म को सही अर्थों में समझने वाली स्त्री… एक झलक में पुरुष के मनोभावों का एक्सरे खींच लेने वाली सहज बुद्धि कहाँ चली जाती है आरती जैसी स्त्रियों में …
  • प्रेमी से भी बिछड़ गई … क्या बिछड़ कर घुट घुट कर जीना ही प्रेम है .. क्या यही प्रेम के साथ न्याय है ?..
  • अपने आप से भी जुदा हुई… जो इतना प्यारा हो वो भूलता ही कब है ?… कभी दिखोगे तो दूर से देख लिया करेंगे ‘तुम्हे’ ,नही तो………..इन्तजार करेंगे तुम्हारा अगले जनम में“
  • पति से भी न जुड पाई होगी सही अर्थों में……..जुड़ती भी कैसे … वहाँ भी जो किया अपने वचन का पालन ही किया …किंचिद यंत्रवत …. कैसे किया होगा ये ईश्वर जाने
  • और स्त्री जाति के लिए एक आदर्श फिर छोड़ गयी… कि प्रेम के नाम पर छले जाना ही नियति है … यही अनुकरणीय है … यही स्त्रियोचित है
  • और प्रेमी जी का क्या हुआ …. उनकी शादी ? ज़रूर हुई होगी …. उनके पास वो साहस कहाँ … कि जीवन यूँ ही गुज़ार देते … आरती की याद में … पश्चाताप में …
  • तभी तो उनके मुंह  से अनायास उद्गार फूट पड़ते हैं …(शायद पश्चाताप के ?)
मगर तीन साल तक हमने उनका साथ नही छोड़ा,उनके सामने उस दिन के बाद कभी नही गये .किन्तु भैया का इलाज करवाया , दो बच्चे हो गये उनके. आज सुखी
है, नौकरी भी लगवा दी भाभी की. आज बत्तीस साल हो गये शक्ल भी नही देखी उनकी , अम्मा कहती है, सूरजदीन तो बुढाए गया है पर आरती तो जैसे उम्र को तुम्हारी यादों की तरह अपने से चिपकाये बैठी है. कौन जाने ? पर…..हम जीते जी उनके सामने नही जायेंगे कभी भी, मूनजी! उन्होंने मुझसे कहा .

……………….जायेंगे भी कैसे …


2 Votes
Quantcast

10 Comments



  1. February 12, 2010 at 5:50 pm
    PP Singh ji bahut achhi story hai, kaisi sanvednao ko aapne prakat kiya hai.
    bahut accha

    1
    0
    Rate This
    Quantcast




  2. February 12, 2010 at 6:24 pm
    मुझे नहीं लगता कि कहानी को आज के युग और परिवेष में देखकर उसके मर्म को जिया जा सकता है. उसे जीने और समझने के लिए उसी युग में, उसी परिवेष में, उन्हीं सामाजिक बन्धनों के ताने बाने में उलझना होगा.
    देवदास आज के युग और परिवेष के होते तो भगा ले गये होते पारो को बिना किसी परेशानी के.

    मैं समझ सकता हूँ कहानी ने आप पर गहरा प्रभाव छोड़ा है. उस तरह से आपने अपने चिन्तन को बहुत उम्दा तरीके से उकेरा है जो कि सोचने को बाध्य करता है.

    इसी कहानी ने मुझे भी उद्वेलित किया था और मैने भी कुछ शब्द रुप दिये थे अपने भावों को. देखियेगा, जब समय निकाल पायें:

    http://udantashtari.blogspot.com/2010/02/blog-post_11.html


    0
    0
    Rate This
    Quantcast




  3. February 12, 2010 at 6:40 pm
    रइसी आर्तियाँ समाज मे जगह जगह मिल जायेंगी किसी न किसी रूप मे। आर्ती केवल कहानी नही थी समाज का सच था उसमे। आपने सही कहा है
    पुरुष युगों से नारी के हर त्याग को अपना अधिकार और
    उसके हर बलिदान को उसकी दुर्बलता मानता आया है। ये तो स्त्री की हतसंज्ञता के
    पार्श्व में उसका सदियों से चला आ रहा शोषण ही है।
    आपकी संवेदना प्रभावित करती है। धन्यवाद्

    0
    0
    Rate This
    Quantcast




  4. February 12, 2010 at 7:14 pm
    हर जगह बस प्यार के बलिदान की बातें होती है किसी ना किसी रूप में ऐसी कहानियाँ सिर्फ़ कहानियाँ ही हो सकती है आज के परिवेश में ऐसा कुछ होना या समाज पर इसका कुछ प्रभाव हो बड़ा मुश्किल है..
    0
    0
    Rate This
    Quantcast






  5. Anita said,

    February 12, 2010 at 7:31 pm
    आरती अपनी जगह ठीक है … उन परिस्थियों और सम्माज का ताना बाना है उस परिवेश में एक सच्ची प्रेमिका इस के अतिरिक्त और क्या करती ?…. किन्तु एक स्त्री के दृष्टिकोण से देखा जाए तो उन के साथ जो हुआ उसे उचित नहीं कहा जा सकता …..
    और हाँ …….
    कोई बड़के भईया के बारे में भी तो कहे ……


    0
    0
    Rate This
    Quantcast




  6. February 12, 2010 at 10:07 pm
    ३२-३३ साल पहले की घटना
    बहूत लम्बा समय है,समाज ,सोच,पीढियां बदल जाती है .
    समाज में आर्थिक,राजनैतिक, बौद्दिक बदलाव निरंतर होते रहेते है
    इन ३२-३३ सालो से पूर्व के जीवन की कल्पना भी नही कर सकती नई जनरेशन
    कई बातों पर अविश्वास करते हुए हंसेगी.
    ‘ऐसा भी होता था ? क्या बात करते हो? हो ही नही सकता .”
    कई बातें आप लोगों को मूर्खताएं लगेगी किन्तु समाज ही नही बदलता मूल्य भी बदलते जाते हैं .
    हर युग के मूल्य अपनी जगह मान्य ,सम्मानीय होते हैं, होने चाहिए .
    भारत के दुसरे हिस्सों का मुझे ज्ञान नही किन्तु राजस्थान में ऐसे कई उदहारण मिल जायेंगे
    सात फेरो के बाद या कुछ समय बाद ही पति कि मृत्यु हो गई और उसके नाम पर उस नव विवाहिता,नव यौवना ने जीवन बीता दिया.ये उस काल का सत्य था
    आज विधवा विवाह मामूली बात हो गई इसी समाज में .मेरे दादा ससुर ने ६० साल पहले मेरी ननद का विधवा विवाह करवाया, हंगामा मच गया .
    समय के साथ मूल्य भी बदलते है मान्यताएं और रीति -नीति ,सोच भी .
    वेरी सिम्पल आज मल्लिका शेरावत,राखी सावंत को देख आपकी उम्र के लोग नाक भौं सिकोड़ते हैं,नई जनरेशन उन्हें पसंद करती है
    आने वाली पीढ़ी आज के बच्चों (जो तब माँ पिता बन चुके होंगी )को कहेगी ‘आपके जमाने में हिरोइन्स इतने कपड़े पहनती थी ?इतनी मोती होती थी?
    आपकी शादी में आपके मम्मी ,पापा,चाची बुआ सब आये थे? बाप रे कितने ‘ओल्ड फेशन ‘के थे आप लोग .
    हा हा हा
    कहानी ने सोचने के लिए बाध्य किया ,बस काफी है इतना ही

    0
    0
    Rate This
    Quantcast




  7. February 12, 2010 at 11:00 pm
    पीपी सिंह जी, आदाब
    आधुनिक युग में भी नारी समानता के अधिकार को पूरी तरह पा नहीं सकी है.
    ये सामाजिक व्यवस्था, कब तक बदलती है, कहना भी मुश्किल है.
    आरती के माध्यम से आपने ज्वलंत मुद्दा उठाया है.

    0
    0
    Rate This
    Quantcast






  8. aradhana said,

    February 13, 2010 at 1:30 am
    “तो हज़ारों लाखों साल से प्रेम के नाम पर, त्याग के नाम पर छले जाने के लिए स्त्री खुद भी उतनी ही जिम्मेदार है जितना कि सामजिक व्यवस्था…” बस इतनी सी बात से आपका दृष्टिकोण सामने आता है और मेरा भी यही है. कहानी जो कहती है, वो दशकों पहले की बात है, पर प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से अब भी होता है. कहानी बहुत मार्मिक है. एकदम बंगला साहित्य के उपन्यासों से मिलती-जुलती. लेखिका को बधाई. और आपको धन्यवाद ऐसी कहानी का परिचय कराने के लिये.
    1
    0
    Rate This
    Quantcast




  9. February 13, 2010 at 10:04 pm
    सोचना शुरू होना…
    और इस पर गंभीर भी होना, और भी बेहतर…
    यह बिगड़ने के लक्षण हैं….


    0
    0
    Rate This
    Quantcast






  10. padmsingh said,

    February 13, 2010 at 10:46 pm
    मै सविनय फिर से कहना चाहता हूँ कि ‘आरती’ जैसे चरित्र की संभाव्यता पर कोई संदेह नहीं है … और न ही उसके त्याग या निर्णय पर … आरती के पास उस परिदृश्य में और कोई चारा नहीं था … परन्तु एक प्रश्न खड़ा हो जाता है मन में … कि प्रेम की परीक्षा लेने वाले समाज की नियति पर कभी प्रश्न चिन्ह क्यों नहीं लगा… उसे अधिकार कौन देता है परीक्षा लेने का … आरतियाँ सदा से होती आई है और होती रहेंगी … जब तक वो अनायास ही समाज को परीक्षा देने को तत्पर रहेंगी… या समाज को परीक्षा लेने का अधिकार देती रहेंगी ….

62 comments:

हृदय पुष्प ने कहा…
"दिल को छू जाने वाले वाकयों से जीवन को जीना सीखा. और पाया, दिल ने हर बार सही रास्ता दिखाया." सत्य और शाश्वत "दिल" गलत हो ही नहीं सकता - सच्ची और अच्छी रचना.
Saloni Subah ने कहा…
it's a great post --- EINDIAWEBGURU
बूझो तो जानें ने कहा…
Bahut hi sundar rachna .
Kiran Sindhu ने कहा…
इंदु जी, आपकी कहानी " आरती " को पढ़कर आपके संवेदनशील ह्रदय का परिचय मिला. इस कहानी में प्रेम का दान, बलिदान और प्रतिदान सभी एक साथ हैं. एक मार्मिक रचना के लिए बधाई स्वीकार करें. किरण सिन्धु.
रश्मि प्रभा... ने कहा…
aapki kalam har zindagi ke panne kholti hai, jo dil ke darwaze par dastak deti hai
Babli ने कहा…
बहुत बढ़िया लिखा है आपने! आपकी लेखनी को सलाम! मेरे सभी ब्लोगों पर आपका स्वागत है ! http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/ http://seawave-babli.blogspot.com/ http://khanamasala.blogspot.com/ http://amazing-shot.blogspot.com/ http://urmi-z-unique.blogspot.com/
निर्मला कपिला ने कहा…
बहुत सुन्दर संवेदनाओं की अथाह गहराई को छूती सुन्दर रचना बधाई
अनामिका की सदाये...... ने कहा…
na jane ye kisi ki asliyet he ya kahani...lekin asliyet jyada lagti hai..dil ko chhu jane wali marmik sachayi...istri agar kuchh drid-nishchey kar le to is dharti ki tareh sab kuchh seh jati hai aur badle me bas deti hi rehti hai..deti hi rehti hai jaise hamari dharti maa..! aur purush... itna balwan hokar itna prabhutv rakhte hue, itna igoistic ho kar bhi hamesha istri ke aage us se kuchh na kuchh mangne k liye ant-teh jhukta hi aaya hai. kaise aarti ne haste haste khud us purush ko LALLA aur khud ko Bhauji keh diya sirf aur sirf ki uske pyar ne us se kuchh manga...apni puri jindgi uske liye de di. jabki vo acchhi tareh janti thi apne bhavi pati k bare me. aaj bhi jaha saccha pyar hai vaha yahi sab dekhne ko milta he. bahut acchhi rachna jo dil ke ander tak kahi.n gehre me ghus gayi.
नीरज गोस्वामी ने कहा…
अति संवेदन शील रचना...दिल के तार झंकृत हो गए... नीरज
Udan Tashtari ने कहा…
यह पोस्टलेखक के द्वारा निकाल दी गई है.
Udan Tashtari ने कहा…
एक अमर प्रेम, एक रुढ़ीवादी समाज, एक संस्कार माँ बाप का सम्मान, धन लोलुपता, मान्यतायें, समर्पण.. त्याग. एक समझौता एक इन्तजार एक विश्वास, एक आस्था पुनर्जन्म की, एक अव्यक्त वादा, एक निर्वहन, एक तपस्या. एक अहसासने वाला धड़कता दिल, एक संवेदना, एक कलम शब्दों की बेजोड़ ताकत, संप्रेषण, एक लेखक कशमकश, श्रृद्धा. एक पाठक आवाक, स्तब्द्ध चेहरा और सन्न मानसिक हालात!! -समीर लाल ’समीर’ 
indu puri ने कहा…
nikali nhi hai baba , padya roop me bheji gai ko sahej kr dobara post ki gai hai. sukhad aashchrya aaj bhi sachche pyar ko pahchan liya jata hai aur maan diya jata hai.thanx to all of you.
वाणी गीत ने कहा…
सच्चे प्यार का ऐसा उदहारण ...वो देखें जो सच्चे प्यार को कुछ मानते ही नहीं ... अंतस तक भिगो गयी ये कथा ...इस कथा से आज की पीढ़ी कुछ प्रतिशत भी सीख सके तो कितना कुछ बदल जाए इस समाज में ... बहुत आभार ..
परमजीत बाली ने कहा…
बहुत गहरे तक उतर गई यह कहानी...बहुत ही मार्मिक और बेहतरीन कहानी है।बहुत बहुत बधाई।
jenny shabnam ने कहा…
indu ji, aarti ke prem ko hum samajh sakte hain lekin is balidaan ko kahi se bhi uchit nahin mante. kaun jane agla jiwan hai ki nahin, lekin is ummid par ye jiwan to chala gaya na aarti bhauji ka. aur wo bhi aise purush ke prem mein jise apne pita ke prati farz yaad raha lekin insaani jazbaat yaad nahi raha. ek puri umrr aise jina behad kathin hai lekin prem ki parkashtah...arti bhauji ko meri taraf se bhi kahiyega गोड़ लागी भौजी. aapko is hriday-sparshi lekhan ke liye badhai.
दिलीप कवठेकर ने कहा…
आपके ब्लोग पर पहली बार आया हूं, और यहां मार्मिक और संवेदना से भरे हुए इस प्रेम के अनोखे रूप को पढ कर द्रवित हो गया. आपके कमेंट्स पढ़ता हूं, पाता हूं कि आपका दिल बच्चे जैसा निर्मल है. आखिर दिल ही तो है. चलो है कोई और भी जहां में, जो इस दिल की आवाज़ पर चलता है. गणित तो नहीं लगाता, नफ़ा नुकसान की पर्वाह नहीं करता, मगर ये मालूम है कि ये सौदा घाटे का कतई नहीं है!!
'अदा' ने कहा…
एक सशक्त रचना 'आरती', भाषा, भाव बहुत भावुक कर गए हमें...सचमुच में वो ज़माना ही कुछ और था जब गलती से भी अगर मुंह से किसी के लिए बहन निकल जाए तो ...ता-उम्र उसे बहन माना आता था....उसी तरह एक बार जब भाभी कह दिया फिर ...वो प्राणेश्वरी कहाँ रह गई.....'वो नपुंसक हैं लल्ला जी' एक बार कहने पर ही रिश्ते कितनी जल्दी बदल गए...ना कोई सवाल ना जिरह....यही तो थी हमारी संस्कृति ....इस कहानी को और ठोस कर गई आपकी भाषा...फणीश्वर नाथ रेणु जी कि याद आगई.....बहुत ही सुन्दर....
Babli ने कहा…
महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनायें!
Kulwant Happy ने कहा…
सशक्त रचना। उड़नतश्तरी से मिला पता। पहले नहीं आ सके, माफ करना खता।
बी एस पाबला ने कहा…
बहुत ही मार्मिक 'अदा' जी से भी सहमत बी एस पाबला
indu puri ने कहा…
blidaan uchit nhi jiwn ki qeemt prkintu ...kya ye itna saral hai ? nhiYE WO bhi janti thi ,aashchrya ki wo aaaj bhi 'unhe' utna hi chahti hai aur ye baat kisi se chhipati bhi nhi .na apne pti,bchchon sepr gaanw chhod diya kewl isliye ki inki ptni sndeh na kre,babuaa ka dil na dukha de kbhi 'unka' naam leke . maryadaaon ki bhi misal kaym ki kahin se bhi meera ,heer,laila, sheeree ke prem se bhauji prem km nhi blki meri njr me jyada bahtreen aur uddat hai ,wo bhi is yug meshareer se pre prem ho skta hai ,isi ka UDAHRN h. bhauji .MAINE HMESHA AISE PREM AUR AISE PREMIYO KI CHOKHT KO CHOOMNA PSND KIYA HAI,KYONKI MERE LIYE WO DR MANDIR ,POOJA STHaL SE KM NHI. ' prem yani 'sharirik sambandh' ?kisne kaha? prem to isse kahin oonchi chij hai.aartee bhauji iska ek udahran hai ,mera uddeshya isi ko ingit karna matr hai.pr........aap jaiso ke vyuz achchhe lgte hain .
indu puri ने कहा…
Reply |jenny shabnam to me show details Feb 12 (2 days ago) indu ji, arti bhauji ka jo prem hai use sunna ya sunaana bahut aasaan hai, lekin kya beeta hoga unpar jab uska wahi premi unse unki puri zindgi maang liya, aur balidaan ke naam par wo apna sab loota dee. premi ki patni ise bardasht nahi kee aur unhe jana pada, kya fir bhi aap kah sakti hai ki samaj kabhi aise prem ko samjhega? unke prem par mai bhi natmastak hun, lekin aise tyag ko mai uchit nahi mantee. aur na hin aise kamjor mard ko samman de sakti. ashariri prem ko mai bhi manti hun, lekin fir samaj keliye kyu kisi aise nikamme se shadi karna jiske sath man na mile aur kabhi prem bhi na janme. khair aap mujhse badi hain, aapka mai samman karti hun, aur ye koi bahas ka mudda bhi nahi, kyuki is sach ko kisi ne jiya hai aur wo ji rahi hai, lekin ek sabak to zarur le sakte hum sabhi ki aise tyag kamse kam hum apne aas paas na hone de, jaha kisi ki zindgi ko tyag kar samman lena pade. aapki samvednaaon ko salam.
indu puri ने कहा…
Reply |jenny shabnam to me show details Feb 12 (2 days ago) bilkul sahi kaha aapne, main bhi aise prem kee parkaashtha par hatprabh hun, aur bahut samman hai unke liye. par unki tarah jina aam insaan ke wash kee baat nahin, aur na hin prem ko koi ji sakta unki tarah. aur na hin samajh sakta. apni aisi paristhiti keliye khamosh sahmati hin to unko mahan bana diya, agar wo inkaar karti to aaj wo ''aarti bhauji'' nahin hoti aur na aapke blog me jagah paati. bahut khoya hoga unhone kabhi unki jagah rah kar mahsoos kijiye, meri to sochkar aankhe bheeg gai. us mahaan mahila ko mera naman. saabhar - Show quoted text - jenny
indu puri ने कहा…
मुझे ऐसे व्यूज़ अच्छे लगते हैं,बहस वाली क्या बात? मैं इस अशरीरी प्यार के आगे नतमस्तक हूँ ,और रहूंगी . सबके अपने विचार है ,जिनका मैं सम्मान करती हूँ . व्यक्तिगत रूप से मैं वहां होती तो ये शादी नही होने देती . मैंने एक दिन सख्ती से कहा ''आरती भौजी की कोई हंसी उडाए मैं सहन नही कर सकती, दुनिया उस औरत को,उसके प्यार को कुछ भी कहे पर आप हम वो सब कर सकते हैं क्या? जो आरती भौजी ने हंसते हंसते कर दिया,उस पर उन्हें आज तक कोई शिकायत नही ,ना इसे वो अपनी कम उम्र का फैसला मानती है . आत्मा कांप जाती है मेरी, उनके बलिदान की कीमत और अवधि की सोच कर . किसी को कोई हक नही है , पर उन पर कोई दबाव,जोर जबरदस्ती नही थी . आप देखिये ईमानदारी सेमैने सब लिखा लडके ने बस कहा,ये भी कि 'हम तुम्हे मजबूर नही कर रहे आरती,तुम्हारी जिन्दगी है और फैसला तुम्हे करना है' ........................................... ......................................... main kya kahti janti ho aarti bhauji ki jagah hoti to, shayd aap bhi yhi kahti 'तु नही,और सही मरना है तो तु मर, तेरे बाप के लिए मैं क्यों मरु?' पर...........आरती भौजी ........प्यार का एक उद्दात रूप प्रेम कहानियो की उन नायिकाओं से कही बहूत ऊंची , जितनी मैंने पढ़ी या सुनी. उम्र में छोटा होने का ये मतलब नही कि हम सच बोलने से पीछे हट जाये .
दिगम्बर नासवा ने कहा…
पूरी पोस्ट और तमाम टिप्पणियाँ और जुड़ी हुई पोस्ट भी पढ़ी हैं ..... आपने जिस प्रेम का अन्वेषण किया है इस कहानी में वो हर युग में रहता है .. पात्र, परिवेश और समाज की परिभाषाएँ बदलती रहती हैं बस ..... आरती का प्रेम जिन उँचाइयों को छू रहा है उसकी मिसाल कम ही मिलती है .. लड़के का प्रेम भी कुछ कम नही है पर वो हालात .. परिवेश .. दबाव में उलझा हुवा है ... आरती के सामने बस एक ही लक्ष है .. प्रेम .. केवल प्रेम ... सब कुछ इस अनंत से जुड़ा है .. कृष्ण के बहुत ही करीब है आरती ... बहुत गहरे घर कर गयी है आपकी कहानी ... वैसे आपके शिल्प का भी कमाल है जो प्रेम को इस उँचाई से देखने के काबिल बना रहा है ....
indu puri ने कहा…
Induji ! Aapke evam Jenni ji ke kashamkash bhare vichaar padhe. Achchha laga ki aap dono Pujyaniya Artiji ke dard ko mahsoos kar rahi hain tatha purane rurhiyon se upar uthkar soch rahin hain. verna dharm ke thekedaron ne to yehan to likh diya tha ki "Nari na mohen nari ke roopa". Mere vichar se aap dono ko thoda sa aur deep men utar jana chahiye. Kyonki ho sakta hai Arti ji evam unke premi (if you can accept this title, kyonki woh to itna neech / patit hoga tabhi to aapne uska koi naam hi nahin diya) ke man me pitragyan se bhi badhkar bhi koi cheej rahi hogi jiske wajah se ya Arti ji ka jyada sukh / sukhi bhavishya dekh kar hi usne unke saamne ye prastaav rakkha ho ???????? Ek baat aur - agar use pitaji ka itna hi dar ya agyakarita ka samman hota to sabke (jisme pitaji bhi shamil hain) virodh ke baad bhi woh unke saath hota hi kyon???????? Baad tk sath kyon deta? doosari baat aur- chahe koi napunsak hi kyon na ho, apni preyasi ki taraf kisi ka dekhna bhi bardaasht nahin kar sakta. Parantu isne to na keval Arti ji ki shaadi pure josh o kharosh ke saath karvayee balki us har cheej ka dhyaan rakha jisse Arti ji khush aur sukhi rah saken. Kya wo aaj tak kabhi bhi Arti ji ko bhula paya hoga??? Kya apni lash ko dhote dhote thak nahi chuka hoga?? Kya aaj bhi jab wo Arti ji ko dekhta hoga to ek baar phir mar nahi jata hoga?? Shayad aap logon ko nahin maloom ki apni hi arthee apne kandhe par dhona kaisa hota hai ?????? Khair, wo bhi khush to nahi hoga aur shayad yehi kahta ho " devtaaon mujhe hr haal me jindaa rakhna .........meri ankhen sada khuli rahen sab o bahaar men. 'Ek bhatkti Atma ' (14 feb. ko prapt mail me jaisa 'bhatkti aatma ' ji ne mujhe likha ,comment box me na likh kr unhone mujhe jane kyon mail karna hi uchit jana? khair jaisa bhi hai hm unki bhavnaon ka smman karte hain.)
अनामिका की सदाये...... ने कहा…
इंदू जी, एक भटकती आत्मा जी की टिप्पणी पढ कर कुछ सवाल मन में उठे जिन्हे में यहा आप से पूछना चाहुंगी..में उनके लिंक तक पहुचना चाहती थी, उन्हे और पढना चाहती थी, लेकिन किसी तऱ्ह भी उन तक नही पहुच सकी...और इसलिये मुझे यहा दुबारा रिव्यू देना पढा .. पहला सवाल तो आपसे कि - क्या आप उन्हे जानती है ? क्या वो प्रेमी अगले जन्म तक की प्रतीक्षा करने को तैयार है ? क्या वो अभी भी वही इच्छा रखता है, या अब वो अपने परिवार, अपने बीबी बच्चो में मस्त हो गया है ? इस 'नायक' को पढ कर लगा कि प्यार कि कही कोई कमी तो नही है...गंभीरता ही गंभीरता ही मुझे दिखाई दी. और वही पीडा, वही कसक उन व्युस में भी है...और पढ कर लगा कि वो खुद ही मीरा है, वही राधा है और वही कृष्ण है. पीडा कि गहनता ही गहनता थी. उनकी कविता कि ये पंक्तीया पढ कर वो शेर याद आया... देवताओ मुझे हर हाल में जिंदा रखना जब बहार आये, मुझे फूल की सूरत देना अगर ये वही है जो मै समझ रही हू...तो उन्हे और उनके प्यार को...त्याग को....कर्तव्य को प्रणाम.
Sadhana Vaid ने कहा…
एक ऐसी कहानी जो अभिभूत कर मन को अंदर तक भिगो गयी | इसका विश्लेषण कर गुण दोषों को ढूँढना आरती के सर्वोच्च प्रेम और बलिदान का अनादर होगा | आरती के प्रेम की पराकाष्ठा यही है कि उसने अपने प्रियतम के आदेश का पालन कर अपना प्यार, अपना सुख अपना जीवन सब कुछ न्यौछावर कर दिया | हाँ जिसके प्रति उसके मन में इतना प्रेम और समर्पण का भाव था वह कायर पुरुष शायद इसके योग्य नहीं था |
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…
आरती भौजी से मिलकर अच्छा लगा! कहानी बहुत मार्मिक है! सीधे हृदय में उतर गई!
अल्पना वर्मा ने कहा…
मार्मिक कहानी ! बहुत ही अच्छा लिखती हैं आप ! होली की शुभकामनाये !
सतीश सक्सेना ने कहा…
लम्बी रचना नहीं पढ़ सका , मगर आपका "अपने बारे में " अच्छा लगा , सादर
सतीश सक्सेना ने कहा…              
 
 
 
 
निर्मला कपिला ने कहा…
कहानी बहुत अच्छी लगी एक टीस सी भी मन मे उठी-- नारी से ही हर त्याग की उमीद क्यों की जाती है। और अच्छा सन्देश भी दिया। मन की आवाज़ कभी गलत नही होती। शुभकामनायें
PADMSINGH ने कहा…
कहानी पर मेरे व्यूज़ इस लिंक पर पढ़ें - http://padmsingh.wordpress.com/2010/02/12/%E2%80%9C%E0%A4%86%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A5%80%E2%80%9D-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%BE/
सतीश सक्सेना ने कहा…
कुछ नया नहीं लिखा आपने ....?? शुभकामनायें !
ई-गुरु राजीव ने कहा…
आपने पढ़ने को कहा, हमने पढ़ा पर टिप्पणी में क्या कहूं ! साहित्य ऐसा ही होता है. यह तो संबंधों और मानव स्वभाव की बात है. आपने तो कहा था कि आपको प्रतिकूल टिप्पणियाँ अधिक मिली हैं, पर यहाँ पर हमें तो ऐसा नहीं लग रहा है. पर हम आप की राय से सहमत नहीं हैं. आपने प्रश्न उठाया कि क्या पात्र ने आरती को अपनी जागीर समझा और वैसा ही व्यवहार किया. ऐसा तो बिलकुल भी नहीं था उसने कहा अवश्य था कि कि बड़े भई से विवाह कर लो पर खुद सोच कर, आखिर तुम्हारी जिंदगी है. आरती का त्याग आपको दिखा पर नायक का त्याग कि पिता की आज्ञा का अनुसरण करने के लिए उसने अपने प्रेम को ठुकरा दिया, उसे क्यों भूल रही हैं ! जो भी हुआ दुखद हुआ, ऐसा नहीं होना चाहिए था. नायक के साथ भी गलत हुआ और नायिका के साथ भी. मेरी संवेदनाएं दोनों के लिए ही हैं. आपका यह कहना कि नारी का शोषण हुआ तो नायक की हालत भी तो बताइये, वह कौन सा मज़े ले रहा है. !! उसकी स्थिति आपकी दृष्टि से छूट गयी है, शायद. खैर मेरी यह टिप्पणी इस कहानी पर आपकी राय से नहीं मेल खाती, पर आप मेरे लिए आदरणीय हैं. :) मेरी टिप्पणी को आप स्वयं के विरुद्ध न समझिएगा.
ई-गुरु राजीव ने कहा…
आपने पढ़ने को कहा, हमने पढ़ा पर टिप्पणी में क्या कहूं ! साहित्य ऐसा ही होता है. यह तो संबंधों और मानव स्वभाव की बात है. आपने तो कहा था कि आपको प्रतिकूल टिप्पणियाँ अधिक मिली हैं, पर यहाँ पर हमें तो ऐसा नहीं लग रहा है. पर हम आप की राय से सहमत नहीं हैं. आपने प्रश्न उठाया कि क्या पात्र ने आरती को अपनी जागीर समझा और वैसा ही व्यवहार किया. ऐसा तो बिलकुल भी नहीं था उसने कहा अवश्य था कि कि बड़े भई से विवाह कर लो पर खुद सोच कर, आखिर तुम्हारी जिंदगी है. आरती का त्याग आपको दिखा पर नायक का त्याग कि पिता की आज्ञा का अनुसरण करने के लिए उसने अपने प्रेम को ठुकरा दिया, उसे क्यों भूल रही हैं ! जो भी हुआ दुखद हुआ, ऐसा नहीं होना चाहिए था. नायक के साथ भी गलत हुआ और नायिका के साथ भी. मेरी संवेदनाएं दोनों के लिए ही हैं. आपका यह कहना कि नारी का शोषण हुआ तो नायक की हालत भी तो बताइये, वह कौन सा मज़े ले रहा है. !! उसकी स्थिति आपकी दृष्टि से छूट गयी है, शायद. खैर मेरी यह टिप्पणी इस कहानी पर आपकी राय से नहीं मेल खाती, पर आप मेरे लिए आदरणीय हैं. :) मेरी टिप्पणी को आप स्वयं के विरुद्ध न समझिएगा.
indu puri ने कहा…
अरे! क्या और कहाँ पढ़ा तुमने ये सब फिर ध्यान से नही पढ़ा. पगले बेटे ! मेरी कहानी ;आरती' में मैंने ऐसा कुछ नही लिखा तुमने शायद पद्म्सिन्ह्जी के 'व्यूज़' को जो उन्होंने इस कहानी से भी बड़ा मुझे भेजा और जिसे मैंने एज इट इज पोस्ट कर दिया था. उस भी 'आरती 'कहानी का हिस्सा समझ लिया है . वापस देखो इसे. ये मेरी वो रचना है जो मेरे दिल के बेहद करीब है क्योंकि मैं 'दोनों'को जानती हूँ और उनके प्यार आगे नतमस्तक हूँ . यदि अगला जन्म वास्तव में होता है तो ईश्वर उन्हें जरूर मिलाये . मुझे नेगेटिव व्यूज़ पसंद हैं ये हमें इम्प्रूव करने का मौका देते हैं.और इस बात का भी सबूत होते हैं कि सामने वाले ऩे इन्हें सचमुच पढ़ा है . थेंक्स बाबा और देखो गडबड कहाँ हुई है तुमसे हा हा हा
indu puri ने कहा…
जैसा की राजीवजी जिन्हें सब ई-गुरु के नाम से जानते हैं उन्होंने मेल के द्वारा अपने विचार 'आरती भौजी'के लिए दिए. राजीव जी --- अरे नहीं... नहीं...आप ने मुझे मेल में दो लिंक दिए हैं, दोनों एक ही पृष्ठ के हैं और मैंने लेख को पढ़ा है. और सारी पैन्तीस टिप्पणियाँ भी पढीं. फिर पंद्रह मिनट बाद अपनी राय दी है. एक बार फिर अपनी राय देता हूँ कि मुझे दोनों से ही सहानुभूति है. जो हुआ दुखद हुआ, नहीं होना चाहिए था, पर किसी का त्याग मेरी अल्प-बुद्धि के अनुसार कम नहीं है. दोष यदि किसी का है तो वह नायक के पिता का है. कमाल है महिला का त्याग सबको दिखा, मुझे भी कोई इनकार नहीं है पर नायक क्यों पैंतीस टिप्पणियों में उपेक्षित है, यह मेरी समझ से बाहर है !! नायक का त्याग भी तो देखो दुनिया वालों !! नायक को भी तो गले लगाओ टिप्पणीकारों !! आपका अपना, ई-गुरु राजीव. http://blogspundit.blogspot.com/
indu puri ने कहा…
राजीव जी ने फिर लिखा-- हाँ, बुआ मैं भी यह इच्छा करता हूँ कि भगवान् उन्हें अगले जन्म में मिलाये. :) आपका अपना, ई-गुरु राजीव. http://blogspundit.blogspot.com/ १२ अप्रैल २०१० ९:०७ PM को, Rajeev Nandan Dwivedi ने लिखा:
moon-uddhv ने कहा…
अपने इस व्यू को यदि कमेन्ट बॉक्स में देते तो मैं दोनों तक पहुंचाती साथ ही सब पढ़ते कि एक दो इंसानों ऩे तो नायक के दर्द,मजबूरी को समझा. सब उस कोसते रहे पर........इतने साल पहले भी और आज भी हर इंसान अपने घर में ऐसा ही बेटा चाहेगा . मेरा तो उनसे कमिटमेंट हो चुका है अगले जन्म में वे मेरे ही गर्भ से जन्म लेंगे और.......'आरती' उनकी ही होगी किसी बाप को उन दोनों की बलि चढ़ाने का कोई अधिकार नही दूँगी और दुनिया से लडूंगी पर....ऐसा मेरे जीते जी कभी नही होगा . कोई क्या जाने अपने अपने बलिदान की कितनी बड़ी कीमत चुकाई है इन दो मासूमों ऩे . मुझे तो तुम्हारे समाज और दुनिया ऩे ये भी अधिकार नही दिया कि दोनों के पैरों पर अपना सिर रख कर चीख चीख कर रो सकूं, राजीव बेटा! मगर ये सबके सामने कहते नही हिचकिचाती कि मेरे जीवन में दोनों भगवान का दर्जा रखते हैं.मैंने नही देखा भगवान कैसे हैं ? पर...शायद ऐसे ही होते होंगे. १२ अप्रैल २०१० ८:३७ AM को
बेनामी ने कहा…
वाणी गीत ने कहा… उस कहानी ने अंतस को जितना द्रवित किया ...आपकी कविता से उससे अधिक मन में श्रद्धा भर गयी ... ...हम एक दूसरे की भावनाओं , अभिव्यक्ति और सप्म्प्रेषण से कितना जुड़ जाते हैं कि कई बार लगता है कि क्या सच ही यह सिर्फ आभासी दुनिया है ...!! 2/11/2010 08:37:00 पूर्वाह्न
moon-uddhv ने कहा…
ब्लॉगर डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा… कविता में रवानी है, उमड़ती इक कहानी है! जहाँ सम्वेदनाएँ है- वहाँ कायम जवानी है! कविता और कथा का ताल-मेल सुन्दर रहा! 2/11/2010 09:25:00 पूर्वाह्न
indu puri ने कहा…
रश्मि प्रभा... ने कहा… kahani,kavita dono ka jawaab nahi 2/11/2010 02:34:00 अपराह्न
indu puri ने कहा…
jaisa ajay ji ne kaha - अजय कुमार झा ने कहा… कहानी और कविता में से किसे बेहतर कहूं या कि किसके लिए कहूं कि उसने ज्यादा द्रवित किया , अभी तय नहीं कर पाया हूं । आपको इन दिनों पढना एक अलग अनुभव दे रहा है 2/11/2010 04:54:00 अपराह्न
बेनामी ने कहा…
shikha varshney ने कहा… katha main bhi kavya sa anand hai or kavita ke to kehne hi kya. 2/11/2010 05:29:00 अपराह्न
indu puri ने कहा…
'अदा' ने कहा… कहानी और कविता दोनों ही लाजवाब हैं... आभार.. 2/11/2010 07:39:00 अपराह्न
Sudheer ने कहा…
अभी कुछ दिनों पहले की ही बात हे जब में भी ये ही मानता था की प्यार का मतलब त्याग .... परन्तु किसका त्याग ये नही समज पाया सो अपने प्यार को ही त्याग दिया ..... पर 7 साल लम्बे बनवास ने मुजे इतना तो सिखा दिया की त्याग करने का मतलब राम बनना नही होता. राम ने बिना सोचे जो त्याग किये जो गलत फैसले लिए उनको आज भी हमारा समाज भुगत रहा है .... आज भी बेटे वनवास भेजे जा रहे है .... आज भी सीता जैसी पत्नियों को अग्नि परीक्षा देने के बाद भी त्याग दिया जाता है ..... अरे में पूछता हूँ इतना हक किसने दिया राम को की वो सीता के जीवन का फैसला भी खुद करे ..... एक बार सोंचे अगर राम ये फैसले लेते तो : 1. पिता के आदेश की अवमानना कर के कह देते की में वनवास नही जाऊंगा और माता केकेयी से सीधे बात करूँगा की ऐसा क्या कारन हुआ जो वो मुजे सौतेला मानने लगी है ...... शायद केकेयी भी मान जाती और पिता दशरथ भी जीवित रहते और राम को 14 वर्ष दुखो में नही गुजारने पड़ते ..... आखिर किसी को तो "initiative" लेना पड़ता है ना..... 2. अगर राम उस धोबी की पत्नी की खाल उधडवा देते की उसकी सीता के चरित्र पर ऊँगली उठाने की हिम्मत केसे हुई तो ना तो आज समाज में चरित्र के नाम पर सीताये वेदी पर चद्ती और धोबी जेसे लोग जहर उगलने से पहले हज़ार बार सोचते ........ तो मेरी नज़र में नायक, उसके पिता, कोई दोषी नही हे ...... दोषी हे राम और वो समाज़ जो राम का अनुसरण हर सही और गलत बात पर करता है ... जो चाहता हे की सब राम बन जाए .... जो की मुमकिन नही है सॉरी मासी कुछ ज्यादा ही लम्बा हो गया but अन्याय कहीं पर भी हो किसी पर भी हो या कोई भी कर रहा हो चाहे भगवन ही ... मुजे अपने पर लगता है ......
निर्झर'नीर ने कहा…
कुछ सपने बन-ढल जायेंगे कुछ दर्द चिता तक जायेंगे कहानी के बारे में तो पहले भी बहुत वार्तालाप होचुका है लेकिन आपका लेखन काफी प्रभावी है
anjalim ने कहा…
bahot hi rochak kahani he,kahani ki gaharai ko samajhane jitana na to mera dimag he aur na hi mere pasand ka shetra ,par ha ek pyara sa, bhauk sa ,sanwedan-shil ,sulajha hua ,man hai mera ,jo ye sochane par majbur karata he ki, kya biti hogi nayak aur naika ke mann pe............. anjali m .goswami
Manoj K ने कहा…
आज बरसात हो रही है, कुछ इन दो आँखों से भी बह निकला है नीर. सच्चा प्यार ऐसा ही होता है. उसकी खुशी के लिए सबकुछ किया. बहुत टिप्पणी मिली है ऊपर.. ज़्यादा नहीं लिख पाऊँगा. कुछ आग अंदर भी लगी है, जो है जल्दी ही नयी पोस्ट बनकर आएगी. आभार मनोज खत्री
राजीव तनेजा ने कहा…
कहानी का ताना-बाना और भाषा शैली ऐसी कि जैसे मुंशी प्रेमचंद जी की कोई रचना पढ़ रहा हूँ ...कथाक्रम आवाक और भौंचक करने वाला... पद्म सिंह जी की बातें भी सोचने पर मजबूर करती हैं.... इस कहानी को पढकर लगा जैसे मैं अभी तक घास ही छील रहा था :-(
दीपक 'मशाल' ने कहा…
पुराने समय में अनावश्यक रूप से प्रचलित प्रथाएं जैसे आज अन्धविश्वास बन चुकी हैं, कुछ वैसे ही हालात ये हकीकत भी पैदा करती है.. फिर वही अगले जनम का नाम लेकर नारी-शोषण. संभव है भावावेश में लिया गया यह निर्णय उस समय एक आदर्श की तरह देखा जाता हो.. शायद आज भी कुछ लोग इसे आदर्श ही समझें. पर यह ना तो तर्क-संगत है और ना ही न्याय संगत. ये सच है कि प्रेम में तर्क को स्थान नहीं है लेकिन क्या शोषण में भी, छल में भी? मुन्ना भाई कि भाषा में कहें तो ''एक उमर के केमिकल लोचे की वजह से ये जिंदगी भर का रोना होता है.'' और वैसे भी ३०-३५ की उम्र पार करते-2 जब ये बात समझ में आती है तब तक बरात आगे बढ़ चुकी होती है. लोग सिर्फ कहानियों में मज़ा लेते हैं.. उनका किसी के सुख-दुःख से सिर्फ क्षणिक रिश्ता होता है जो अंत तक पहुँचते-२ आह या वाह के साथ यह रिश्ता टूट भी जाता है. लोग मीरा के प्रेम में भी कहानी देखते हैं और अमृता प्रीतम के में भी.....
राज भाटिय़ा ने कहा…
अजी बहुत ही छोटे फ़ंट मे लिखी गई हे आप की यह रचना लेसे पढू?
प्रवीण त्रिवेदी ╬ PRAVEEN TRIVEDI ने कहा…
कहानी जिस समय के परिदृश्य की है ......उस समय इसे महसूस किया जा सकता है ....यह तो मानता हूँ ! .....पर आज यह संभव नहीं है ......और यदि संभव होने लगे तो इसे संभव होने देना नहीं चाहिए| मेरा व्यक्तिगत विचार है कि इस कहानी में व्यक्तिगत रूप से प्रेमी ने प्रेम के धर्मं का उल्लंघन किया है| भले ही उसने किसी और रिश्तों के प्रति अपने धर्म का निर्वहन किया हो .....पर अपनी प्रेमिका के प्रति छल और केवल छल ......वह भी मीठी चाशनी में डुबोया हुआ !
Tarkeshwar Giri ने कहा…
दिलो -दिमाग पर सीधे असर डालती हैं ये कहानी. बहुत ही सुन्दर.
राजेश उत्‍साही ने कहा…
यह प्रेम नहीं है। यह त्‍याग है और शोषण है। त्‍याग प्रेम से ऊपर होता है। त्‍याग करने वाले को प्रेम की अपेक्षा करनी भी नहीं चाहिए। हां यह बात अलग है कि बिना किसी चीज से प्रेम किए त्‍याग की पराकाष्‍ठा को प्राप्‍त नहीं किया जा सकता। * कहानी और उसकी समीक्षा दोनों प्रभावित करती हैं।
राज भाटिय़ा ने कहा…
शायद प्रेम इसे ही कह्ते हे, कहानी बहुत सुंदर लगी धन्यवाद
Rahul Singh ने कहा…
यही उद्दाम भावुकता है, जहां अप्रत्‍याशित जन्‍म लेता है.
इंदु पुरी ने कहा…
फेसबुक पर दिए गए मटुक नाथ जी के विचार मैं ज्यों के त्यों पोस्ट कर रही हूँ. Matuk Nath 9:22am Jun 5 प्रिय इन्दुजी मैं आपकी कहानी ‘आरती’ पढ़ गया। इसे कहानी नहीं कहा जा सकता है। क्या कहना है, क्यों कहना है और कैसे कहना है, इसका सम्यक् ज्ञान न हो तो कहानी नहीं बनती है। जो मन में आये, जैसे आये, वैसे ही लिख मारने से अगर कहानी बनती हो तो यह कहानी है जरूर और तब मैं कहूँगा कि यह मूढ़ों की कहानी है। यह प्रेम कहानी नहीं है। इसमें तो किसी को किसी से प्रेम नहीं है। तीन मुख्य पात्र हैं- आरती, उसका प्रेमी और प्रेमी का बाप। आपने इन दोनों को नाम तक नहीं दिया है ! बेटे को आपने श्रवण कुमार, राम , लक्ष्मण और भरत सब एक साथ कह दिया! श्रवण ने बूढ़े और अशक्त पिता की सेवा की थी। यह लड़का दबंग और सशक्त पिता का गुलाम है। राम, लक्ष्मण, और भरत में से किसी ने पिता की बात नहीं मानी थी। पिता नहीं चाहते थे कि राम वन को जायँ, उनके वियोग में मर भी गये, लेकिन राम ने इसकी परवाह नहीं की। लक्ष्मण को पिता से ज्यादा भाई से प्रेम था। इसलिए वे भी भाई की सेवा में ही रहे। भरत ने भी राजगद्दी स्वीकार नहीं की। सभी राम के प्रेम में थे और सबने अपने प्रेम का निर्वाह किया। लेकिन आपकी कहानी का नायक बोतल प्रेमी कहीं से प्रेमी नहीं दिखता है। आपने इसे ‘जीनियस’, संस्कारी और सिद्धान्तवाला बताया है। वास्तव में यह है मंदबुद्धि का, कुसंस्कारी, सिद्धान्तहीन और मानसिक रूप से गुलाम एक पुरुषार्थहीन पुत्र। जिस समय यह आरती के पास शराबी से ब्याह कर लेने का प्रस्ताव लेकर गया था, उस समय इसकी जीभ गल जानी चाहिए थी। लेकिन इस लुंज-पुंज, संस्कारहीन, विचारहीन और हृदयहीन लड़के ने वही सब किया जो यह कर सकता था। आरती को आपने स्ट्रांग कैरेक्टर का बताया है। मैं इसे उच्च चरित्र की स्त्री तभी मानता जब अपने प्रेमी को छोड़कर किसी को वरण नहीं करती। इसका कैरेक्टर तो बड़ा ढीला है। जो उस छोकरे ने प्रस्ताव रखा, उसे मान लिया। उसे फटकार तक नहीं लगायी। बच्चा पैदा कर रही है अपने शराबी पति से और प्यार कर रही है अपने बेवफा नासमझ प्रेमी से। यही है उच्च चरित्र की अवधारणा ? कहानी जरा-सी भी विश्वसनीय नहीं है। होगी भी कैसे ? यह कहानी आपके अनुभव से नहीं आयी है। आपने अपनी आँखों से इस तरह की घटना नहीं देखी है। आपने महज सुनी सुनायी बात को लिख दिया है। जरा भी प्रश्न नहीं उठाया। वास्तव में जिस रूप में घटना घटी होगी, उसके पात्रों के मनोविज्ञान को, उनकी स्थिति को, उनके प्यार के स्तर को आपने जरा भी जाँचा-परखा नहीं है। कौन-सी घटना किस मनःस्थिति और परिस्थिति में घट सकती है, इसका बोध न हो तो कहानी कैसे बनेगी ? कहानी के आरंभ में अपने बारे में बताना अजीब लगता है ! कहानी कहने का, लिखने का एक ढंग होता है। उसे जानना चाहिए, कुछ अच्छी अच्छी कहानियाँ पढ़नी भी चाहिए। मैं आपकी कहानी को कहानी नहीं मानता। न सिर्फ इसलिए कि इसमें कोई शिल्प नहीं है, बल्कि इसलिए भी कि इसमें कोई संवेदना भी नहीं है- न कहीं दिल है, न दिमाग। Matuk Nath
इंदु पुरी ने कहा…
Indu Puri Indu Puri 9:55am Jun 5 ये आपके व्यक्तिगत विचार है मैं उनका सम्मान करती हूँ.आपके विचारों को ज्यो का त्यों अपने ब्लॉग पर पोस्ट कर दूँ? मुझे ख़ुशी है कि आपके कमेंट्स कमेंट्स न हो कर व्यूज़ है.जो आम भी नही है. जरुर पढूंगी और अपनी लेखनी को सुधारुंगी.आप जैसा गुरु यूँ ही तो नही चुना मैंने.हा हा हा थेंक्स
इंदु पुरी ने कहा…
मटुक नाथ जी ने पुनः अपने जवाब में लिखा aapne meri bambaari ko sahajta se liya, yah aapka badappan. aap kasouti par khari utrin. saadhuwaad. main aapki shesh kriti bhi padhoonga. aapne mujhe guru chuna, aabhari hoon, lekin yaad rakhengi ki main pyaar karne waala guru hoon. ha ha....

एक टिप्पणी भेजें